संस्थाएं
अणुव्रत लेखक संगोष्ठी का आयोजन
अनुविभा के निर्देशानुसार अणुव्रत समिति, दिल्ली ने अणुव्रत लेखक संगोष्ठी का आयोजन भारतीय लोक प्रशासन संस्थान के साथ संयुक्त तत्वावधान में लोक प्रशासन संस्थान के ऑडिटोरियम में आयोजित किया। संगोष्ठी का विषय था-‘भारतीय ज्ञान प्रणाली और अणुव्रत (इंडियन नॉलेज सिस्टम एंड अणुव्रत)’। चार सत्रों में कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम के दौरान लगभग 150 लोगों की उपस्थिति सुबह से शाम तक बनी रही। कार्यक्रम बहूश्रुत मुनि उदित कुमारजी के सान्निध्य में आयोजित किया गया। कार्यक्रम का कुशल संचालन अनिल दत्त मिश्रा ने किया। अध्यक्ष बाबूलाल गोलछा ने आए हुए सभी अतिथियों का स्वागत एवं अभिनंदन किया तथा विषय पर अपने विचार रखें।
आईआईपीए की तरफ से संजीव तिवारी ने सभी का स्वागत किया और ‘भारतीय ज्ञान प्रणाली और अणुव्रत’ पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि बीच में औपनिवेशिक उपनिवेश काल में भारतीय ज्ञान परंपरा को कुंद किया गया, लेकिन भारत की समृद्ध यात्रा रुकी नहीं, इतिहास के उदाहरण द्वारा उन्होंने इन चीजों को समझाने की कोशिश की। उन्होंने बताया कि नालंदा में हमारा बहुत बड़ा साहित्य जला दिया गया, भारतीय ज्ञान परंपरा पर एक बहुत बड़ा हमला था, परंतु भारतीय ज्ञान धारा निरंतर प्रवाहित होती रही। कार्यक्रम का आरंभ अणुव्रत गीत के संगान से हुआ। सभी अतिथियों और लेखकों ने विषय पर अपने महत्वपूर्ण विचार रखे। सभी ने अणुव्रत आचार संहिता और अणुव्रत गीत की पंक्तियां को समाहित करते हुए भारतीय ज्ञान परंपरा के साथ जोड़ते हुए अपने महत्वपूर्ण विचार रखे। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि अतुल कुमार तिवारी (आईएएस फॉर्मर सेक्रेट्री स्किल इंडिया), प्रोफेसर गिरेश्वर मिश्रा (फार्मर वाइस चांसलर महात्मा गांधी इंटरनेशनल हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा) प्रोफेसर सुधा सिंह एवओडी (डिपार्टमेंट ऑफ़ हिंदी दिल्ली यूनिवर्सिटी), अमिताभ रंजन (रजिस्टर, आईआइपीए)।
दिल्ली विश्वविद्यालय एवं इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय के प्राचार्य एवं प्रोफेसर आदि 20 अतिथियों ने भी अपने विचार इस विषय पर रखें। बहुश्रुत मुनि उदित कुमार जी ने अपनी प्रेरणादाई उद्बोधन से पूरी सभा को दिशा दी। मुनिश्री ने अपने उद्बोधन में भारतीय ज्ञान परंपरा और अणुव्रत के गहने अंतर संबंधों को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल ग्रंथों या दर्शन तक सीमित नहीं है बल्कि यह जीवन जीने की एक व्यवहारिक कला है, जब हम इस महान ज्ञान को अपने दैनिक जीवन में छोटे-छोटे संकल्पों के माध्यम से उतरते हैं तो वही अणुव्रत का रूप ले लेता है।
आज के पर्यावरण संकट और मानसिक तनाव का एकमात्र समाधान हमारे इसी आत्म-अनुशासन और संयम में छुपा है। भारतीय शिक्षा प्रणाली प्रशिक्षण, प्रयोग और प्रतिबद्धता तीन चीजों पर निर्धारित थी पहले तीनों चीज बराबर थी। प्रशिक्षण उसके बाद प्रयोग और फिर प्रतिबद्धता, प्रशिक्षण आज भी हो रहा है लेकिन प्रयोग कम हो रहे हैं और प्रतिबद्धता बहुत कम हो गई है तीनों का समन्वय से प्रशिक्षण पूरा होता है पुराने समय में गुरुकुल में रहकर ही प्रशिक्षण होता था और वहाँ हर तरह की शिक्षा दी जाती थी छोटे से छोटे काम से लेकर ज्ञान विज्ञान तक।
आज शिक्षा अर्निंग बेस हो गई है, मैं क्या पढ़ूं की कम मेहनत में ज्यादा कमा सकूं, इसलिए सत्यता, प्रमाणिकता पीछे रह गई है, पद, पैसा, प्रतिष्ठा आगे हो गए हैं। आचार्य श्री तुलसी ने कहा कि ‘मौलिकता रहे सुरक्षित परिवर्तन यदि अपेक्षित’ हमारे मौलिक तत्व, ज्ञान, परंपरा सुरक्षित रहने चाहिए।
सम्यक दृष्टिकोण बने संवेदनशीलता रहे तभी हमारे ज्ञान परंपरा आगे बढ़ सकती है। आचार्य श्री तुलसी ने कहा कि ‘असली आजादी अपनाओ’ अपने आदर्शों को अपनाओ अपने मूल्यों को सुरक्षित रखें तभी हम आगे बढ़ पाएंगे अणुव्रत केवल जीवन मूल्यों को लेकर चलने का आंदोलन है अच्छे मूल्य नैतिकता प्रमाणिकता अणुव्रत का सार है। कार्यक्रम में अनुविभा के मुख्य न्यासी तेजकरण सुराणा, अणुव्रत विश्व भारती सोसाइटी के पूर्व महामंत्री भीकमचंद सुराणा आदि उपस्थित रहे। आभार ज्ञापन मंत्री पवन गिड़िया ने मुनिश्री, आईआईपीए एवं उपस्थित सभी का आभार व्यक्त किया।