स्वाध्याय
धर्म है उत्कृष्ट मंगल
संस्थाओं के साथ जुड़े कार्यकर्त्ता के प्रति समाज का विश्वास होना जरूरी है। उसके लिए आवश्यक है-कार्यकर्त्ता प्रामाणिक हो। यदि उसमें प्रामाणिकता नहीं है तो कार्यकर्त्ता में सबसे बड़ी कमी रह जाती है। कार्यक्षमता होने के बावजूद अप्रामाणिकता की कोई छोटी-सी कमी यदि सामने आ जाती है तो समाज का उसके प्रति विश्वास उठ जाता है। संस्थाओं/सभाओं/ परिषदों का अपना निजी आर्थिक कोष होता है। उसमें कार्यकर्त्ता यदि कोई घोटाला जैसी बात कर दे तो वह उसके जीवन में एक लांछन लग जाता है और वह समाज का विश्वास खो देता है। इसलिए कार्यकर्त्ता में ईमानदारी और प्रामाणिकता होनी चाहिए।
मैंने एक बार किसी पत्र या पुस्तक में पढ़ा था कि बनारस विश्वविद्यालय के कुलपति थे–'नरेन्द्र देव'। एक बार वे रिक्शे में बैठकर कहीं जा रहे थे। उन्हें रिक्शे में बैठे देख एक आदमी ने कहा-कुलपति महोदय! आप रिक्शे में बैठकर यात्रा क्यों करते हैं? उन्होंने कहा- भाई! कार में यात्रा करुँ, उतना पैसा मेरे पास नहीं है।
आप क्या बात करते हैं, आप तो कुलपति हैं, यूनिवर्सिटी की ओर से आपको कार प्राप्त है, फिर आप कार का उपयोग क्यों नहीं करते?
नरेन्द्र देव ने कहा महाशय! मुझे कार मिली है, वह विश्वविद्यालय के कार्यों के लिए मिली है, निजी कार्यों के लिए नहीं। यह है प्रामाणिकता को भावना।
किसी संस्था के पदाधिकारी हो या अन्य किसी बड़े ओहदे पर कोई कार्यकर्त्ता हो, समाज उस पर विश्वास करता है, तो समाज के प्रति कार्यकर्त्ता का भी दायित्व है कि वह समाज के विश्वास को बनाए रखे। और वह तब बनाए रख सकता है जब उसके जीवन में प्रामाणिकता तथा ईमानदारी की भावना हो। समाज का एक पैसा भी व्यक्तिगत काम में कभी कहीं खर्च न हो जाए, पूरी प्रामाणिकता का ध्यान रखे। अतः कार्यकर्त्ता का चौथा मौलिक गुण है-प्रामाणिकता।
व्यक्ति जिस क्षेत्र में काम करता है उस क्षेत्र की दक्षता, कार्यक्षमता उसमें होनी जरूरी है। किसी संस्था का पदाधिकारी है तो संस्था का संचालन करने की दक्षता उसमें होनी चाहिए। दक्षता निसर्गत: भी होती है और अर्जित भी। यादि व्यक्ति में निसर्गत: क्षमता न हो तो अभ्यास प्रशिक्षण के द्वारा उसे प्राप्त कर सकता है। उस क्षेत्र में योग्य बनने के लिए या तो ऐसे प्रशिक्षण केन्द्र में भाग ले; या इस तरह का साहित्य पढ़े जो उस क्षेत्र के कार्यों के अनुकूल हो, काम करने का दिशानिर्देशन देने वाला हो। या ऐसे लोगों, जिन्होंने उस क्षेत्र में काम किया हैं, के अनुभवों का उपयोग करे तो भी व्यक्ति उस क्षेत्र में कार्यक्षम बन सकता है। यद्यपि सब कार्यकर्त्ता एक समान नहीं होते। कुछ में अधिक कार्यक्षमता होती है, कुछ में कम होती है, फिर भी कार्यकर्त्ता का लक्ष्य रहे कि मैं अपनी कार्यक्षमता को बढ़ाता रहूं।
कार्यक्षमता हो पर कार्य में परिश्रम करने की भावना न हो, श्रमशीलता न हो तो भी कार्यकर्त्ता में अधूरापन-सा रह जाता है। कार्यकर्त्ता तो सेवक होता है, उसे तो रात को बारह बजे भी जरूरत पड़े तो काम के लिए तैयार रहना होता है। अध्ययन के क्षेत्र में कहा गया है–
'सुखार्थिनः कुतो विद्या, कुतो विद्यार्थिनः सुखम् ।'
सुखार्थी के लिए विद्या नहीं होती और जो विद्यार्थी होता है उसे सुख, सुविधा, आराम नहीं मिलता। मैं थोड़ा-सा इसमें परिवर्तन इस प्रकार करना चाहता हूं–
'सुखार्थिनः कुतः कार्यम्, कुतः कार्यार्थिनः सुखम्।'
जो कार्यार्थी है उसे सुख, आराम सुलभ कहां? और जो सुख, आराम से रहना चाहेगा वह काम कैसे कर पाएगा? संस्कृत में एक बहुत अच्छा श्लोक है कि जो काम करने वाला होता है, वह कैसा होना चाहिए, कितना श्रमशील और कष्ट सहिष्णु होना चाहिए-
क्वचिद्भूमौशयाः क्वचिदपि च पर्यंकशयनम्,
क्वचिद्कंथाधारी क्वचिदपि च माल्यांबरधरः ।
क्वचिच्छाकाहारः क्वचिदपि च शाल्योदनरुचिः,
मनस्वी कार्यार्थी न गणयति दुःखम् न च सुखम् ।।