स्वाध्याय
संबोधि
श्वास पर चित्त को एकाग्र करने का दूसरा फलितार्थ होता है-शरीर और स्वयं-दोनों के पृथक्त्व का बोध। इसके आगे श्वास की पृथक्ता भी प्रतीत होगी। मैं अलग हूं, संसार अलग है और शरीर अलग है। निरालंबन ध्यान में इसका महत्त्वपूर्ण स्थान है। भेद-विज्ञान साधना का प्रमुख ध्येय है। शरीर और चेतना के पृथक् बोध के पश्चात् आत्म-ध्यान असहज नहीं होता। यदि हम थोड़ी-सी कुशलता संपादन कर लें तो सभी एकाग्रता के साधनों से यह प्रतिफलित हो सकता है। ध्याता और ध्येय यह द्वैत सबमें उपस्थित रहता है। सिर्फ उस दूरी को देखना है। ध्येय पृथक् है, मैं पृथक् हूं, ध्यान को शनैः शनैः बाहर से हटाकर ध्याता की तरफ ले जाने से क्रमशः वह स्पष्ट होने लगता है और बाहर के ध्येय को छोड़ने में भी कठिनाई नहीं होती। केवल बाहर को पकड़कर उसमें ही चित्त को नियोजित करने से वह थोड़ा-सा असाध्य बन जाता है। साधना सिर्फ लक्ष्य को साधने के लिए है। वह मात्र साधना है। साध्य-प्राप्ति के बाद उसे पकड़े रखना बुद्धिमत्ता नहीं होती। किन्तु बाहर की एकाग्रता का आनंद इतना प्रिय हो जाता है तब अंदर से योग होना सहज नहीं रहता। ध्येय की च्युति न हो, यह स्मृत रहना चाहिए।
पदस्य ध्यान
पदस्थ ध्यान शब्दानुसारी होता है। उसमें वर्षा, मातृका मंत्र तथा बीजाक्षरों का प्राधान्य रहता है। शब्द के माध्यम से अशब्द में प्रवेश का यह द्वार है। इसलिए योग के अंतर्गत इसकी गणना की गई है। तंत्र साहित्य में वर्ण का बहुत बड़ा महत्त्व है। वहां वर्ण के पर्यायवाची शब्द हैं-माता, शक्तियां, देवियां, रश्मि और कला। प्रत्येक वर्ण शक्तियुक्त है। तंत्रों में उनकी शक्तियों का वर्णन किया है। परात्रिंशिका में सकार को तीसरा ब्रह्म कहा है। 'स' वर्ण के द्वारा संसार स्फुट से प्रकाशित होता है, प्रत्यभिज्ञा शास्त्र में यह उल्लेख है। शब्द और अर्थ में अविनाभावी संबंध है। कालीदास ने शब्द और अर्थ को शिव और पार्वती के रूप में वन्दना की है। शब्दों का संहारक और उन्नायक रूप आज के वैज्ञानिक युग में अस्पष्ट नहीं है। शब्दशक्ति का प्रभाव मनुष्य से लेकर पेड़ पौधे तक काम कर रहा है। पौधे और पशुओं पर होने वाली संगीत-लहरियों के प्रभाव की घटनाएं हमने पढ़ी है, सुनी हैं। पशु अधिक मात्रा में दूध देने लगते हैं। पौधों का विकास संवर्द्धन शीघ्र होता है। अशुभ शब्दों का प्रभाव इसके विपरीत होता है।
रंग
भारतीय मनीषियों ने रंगों के महत्त्व की भी खोज की है। मातृका विवेक में अकार के संबंध में कहा है-अकार सर्व देवों वाला है, रक्त वर्ण वाला है, सबको वश करने वाला है। स्पर्श संज्ञा वाले 'क' से 'म' पर्यन्त अक्षर विद्रुम के समान वर्ण वाले हैं। 'य' से 'क्ष' तक के पीत वर्ण वाले हैं। किन्तु एक 'क्ष' अरुण वर्ण का है। कुछ लोगों का ऐसा भी मत है कि सभी वर्ण शुक्ल वर्ण वाले होते है।
ऋषि और छन्द
प्रत्येक वर्ण का एक-एक मंत्र माना गया है। इसलिए उसका अलग-अलग ऋषि, छन्त्र, देवता, शक्ति आदि होने का उल्लेख 'शारदा तिलकतंत्र पदार्थादर्श टीका में है।
मातृका
वर्णमाला के समुदित रूप को मातृका कहते हैं। तंत्र के अनेक ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है। मातृका की महिमा का वर्णन भी कम नहीं है। तंत्र में कहा है- 'न विधा मातृका परा' मातृका से परे और कोई विद्या नहीं है। महादेवी के रूप में उसकी वन्दना की गई है। 'मन्त्राणां मातृभूता च, मातृका परमेश्वरी' यह मातृका मंत्रों की माता के समान परमेश्वरी है। तंत्र शास्त्रों में मंत्र माता के रूप में सम्मानित है। मातृकाओं के सात या आठ वर्ग का उल्लेख अधिकारी व्यक्तियों ने किया है– अ, क, च, ट, त, प, य, श।
जैन साहित्य में भी मातृकाओं के ध्यान की चर्चा है। आचार्य शुभचन्द्र ने ज्ञानार्णव में कहा है–
'ध्यायेदनादिसिद्धान्तप्रसिद्धां वर्णमातृकाम्।
निःशेषशब्दविन्यासजन्मभूमिं जगन्नुताम्।।'
अनादि सिद्धांत में प्रसिद्ध मातृका 'स्वर और व्यंजन' का चिंतन करें। क्योंकि यह वर्णमातृका संपूर्ण शब्द-विन्यास की जन्मभूमि और विश्ववंदनीय है।