तेरापंथ-मेरापंथ कार्यशाला का आयोजन

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पूर्वांचल कोलकाता।

तेरापंथ-मेरापंथ कार्यशाला का आयोजन

युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी के सुशिष्य मुनि जिनेश कुमार जी ठाणा-3 के सान्निध्य में जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा के निर्देशन में तेरापंथ मेरापंथ कार्यशाला का आयोजन जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा (कलकत्ता-पूर्वांचल) ट्रस्ट द्वारा अथर्व बैंक्वेट में किया गया। कार्यशाला में प्रशिक्षक उपासक प्राध्यापक डालिमचंद नौलखा थे।
कार्यशाला में उपस्थित धर्म श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए मुनि जिनेश कुमार जी ने कहा- जीव सुनकर ही कल्याण को जानता है सुनकर ही पाप को जानता है। दोनों को सुनकर ही जाने जाते हैं। जो श्रेय है उसका आचरण करना चाहिए। तेरापंथ के आद्य प्रवर्तक आचार्य भिक्षु ने श्रेय के पथ बढ़ने, चलने के लिए धर्मक्रांति की। वह धर्म क्रांति ही तेरापंथ के रूप में विख्यात हुई। उनका ज्ञान निर्घम अग्नि सा निर्मल, दर्शन ध्रुव तारे सा निश्चल और चारित्र स्फटिक सा उज्ज्वल था। वे प्रज्ञा सम्पन्न कुशाग्र बुद्धि के धनी, क्रांतिकारी महापुरूप थे। वे तार्किक दार्शनिक आगमवेत्ता, व्यवहार कुशल, आचार सम्पन्न व पापभीरू थे। वे अनुशासित, आत्मार्थी व जिन -वाणी के प्रति समर्पित थे। उन्होंने आचार के साथ विचार क्रांति भी की और व्यवस्था क्रांति भी की। तेरापंथ को सिर्फ माने ही नहीं अपितु उसको जाने और जीएं। यह प्रभु महावीर का पंथ है। तेरापंथ महावीर की अहिंसा का महाभाष्य है। तेरापंथ : मेरापंथ कार्यशाला के माध्यम से सभी लोग तेरापंथ के विचार दर्शन को समझने का प्रयत्न करें। मुनि जिनेश कुमार जी ने कार्यशाला में संभागियों को प्रशिक्षण प्रदान किया। मुनि कुणाल कुमार जी ने सुमधुर गीत का संगान किया। इस अवसर पर अहमदाबार से समागत उपासक प्राध्यापक डालिमचंद नौलखा ने संभागियों को प्रशिक्षण प्रदान किया। उन्होंने तेरापंथ के सिद्धान्तों को विस्तार से समझाया। स्वागत भाषण पूर्वांचल सभा के अध्यक्ष संजय जी सिंघी ने दिया। कार्यक्रम का शुभारंभ तेरापंथ महिला मंडल की बहनों के मंगलाचरण से हुई। आभार ज्ञापन सभा के मंत्री पंकज डोसी ने दिया। कार्यक्रम का संचालन मुनि परमानंद जी ने किया। कार्यशाला में कुल 245 भाई-बहिनों ने हिस्सा लिया। कार्यशाला को सफल बनाने में कार्यकताओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा।