गुरुवाणी/ केन्द्र
ज्ञानी और अनुभवी बड़ों के पास बैठने मात्र से रुक जाते हैं अशुभ योग : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्म संघ के एकादशमाधिशास्ता, अखंड परिव्राजक, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण जी ने सुधर्मा सभा में 'पाप श्रमण कौन' विषय पर उत्तराध्ययन सूत्र के माध्यम से अमृत देशना प्रदान की। आचार्यश्री ने श्रमण धर्म की महत्ता बताते हुए साधक जीवन में आने वाले प्रमाद के प्रति सचेत किया और फरमाया कि दीक्षा के बाद भी यदि चर्या में अजागरूकता है, तो साधुत्व अपनी गरिमा खो देता है। बड़ों की पर्युपासना और संवाद की कला : आचार्य प्रवर ने ज्ञानियों की संगति और सेवा के व्यावहारिक पक्ष को स्पष्ट करते हुए मुख्य बिंदु रेखांकित किए।
१. अशुभ योगों से बचाव : श्रमण धर्म को गहराई से समझने के लिए बहुश्रुत (ज्ञानियों) की पर्युपासना अनिवार्य है। यदि बड़ों के पास बैठकर सीधा संवाद न भी हो, तब भी उनके सानिध्य मात्र से जीवन में प्रमाद और अशुभ योगों से स्वतः बचाव हो जाता है।
२. व्यवहार कुशलता की सीख : अनुभवी और ज्ञानी पुरुषों के पास बैठने से मनुष्य जीवन में व्यवहार करने, मर्यादित बात करने और किसी भी प्रश्न का सटीक उत्तर देने की अद्भुत कला सीख सकता है। इसी मार्गदर्शन से मन में विरक्ति जागती है और जीव साधुत्व की ओर बढ़ता है। 'पाप श्रमण' के लक्षण और आत्म-समीक्षा का आह्वान : शांतिदूत ने आगम गाथाओं के आलोक में प्रमादी साधु की वृत्तियों पर तीखा प्रहार किया और सजग रहने के सूत्र दिए।
१. सुविधाशीलता का मनोभाव : दीक्षा (प्रव्रज्या) ग्रहण करने के पश्चात् भी श्रमण-श्रमण में बड़ा अंतर हो सकता है। कोई श्रेष्ठ साधक होता है, तो कोई प्रमादी। जो साधु साधना के वास्तविक पुरुषार्थ और पराक्रम से जी चुराता है, वह 'पाप श्रमण' की श्रेणी में आता है।
२. अजागरूक चर्या : आहार-पानी करके सुख से सो जाना, स्वाध्याय-जप न करना, बार-बार नींद लेना, और जिन आचार्यों-उपाध्यायों से ज्ञान सीखा है, पीठ पीछे उन्हीं की निंदा करना व उनकी सम्यक् चिंता न करना ही पाप श्रमण के मुख्य लक्षण हैं।
३. साधकों को कड़ा निर्देश : चतुर्विध धर्मसंघ की चारित्रात्माओं को स्वयं के भीतर झांककर यह चिंतन करना चाहिए कि यदि ऐसे प्रमादी लक्षण स्वयं में दिखें, तो उन्हें तुरंत दूर कर श्रुत सामायिक और पराक्रम की ओर कदम बढ़ाना चाहिए। सघन साधना शिविर की सराहना : पूज्य प्रवर ने चातुर्मास प्रवास स्थल पर चल रहे सघन साधना शिविर की सराहना करते हुए फरमाया कि जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा के तत्त्वाधान में चल रहा यह उपक्रम बेहद निष्पत्ति पूर्ण है। यदि इन शिविरों के माध्यम से बालक-बालिकाओं के भीतर साधना के गहरे संस्कार पैदा होते हैं और कोई वैराग्य की ओर बढ़कर मुमुक्षु बनता है, तो यह शासन के लिए गौरव की बात है। योगक्षेम वर्ष में ऐसे अनेक शिविर लगाए जाने चाहिए। मंगल प्रवचन के संपन्न होने पर पूज्य प्रवर ने उपस्थित चारित्रात्माओं द्वारा प्रस्तुत की गई विविध तात्विक जिज्ञासाओं का अत्यंत सरल शब्दों में समाधान किया।