बड़ों को वंदन करने से होता है नीच गोत्र का क्षय और उच्च गोत्र का बंध : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 25 मई, 2026

बड़ों को वंदन करने से होता है नीच गोत्र का क्षय और उच्च गोत्र का बंध : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, तीर्थंकर के प्रतिनिधि, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण जी ने सुधर्मा सभा में 'पूजा सत्कार की चाह नहीं' विषय पर उत्तराध्ययन सूत्र के माध्यम से पावन प्रतिबोध प्रदान किया।
आचार्यश्री ने भिक्षु जीवन की कसौटियों को स्पष्ट करते हुए फरमाया कि एक सच्चे साधक को लोकैषणा, सम्मान और प्रशंसा की आकांक्षा से सर्वथा मुक्त होकर केवल आत्मा की गवेषणा में लीन रहना चाहिए।
लोकैषणा का त्याग और भिक्षु का मूल स्वरूप : आचार्य प्रवर ने आगम गाथाओं के आलोक में साधु चर्या के नियमों को स्पष्ट करते हुए मुख्य बिंदु रेखांकित किए:
१. सत्कार की चाह से मुक्ति : साधु वही है जो संसार में किसी भी प्रकार के आदर, सम्मान या पूजा की इच्छा नहीं रखता। साधु की यह मांग या आकांक्षा कभी नहीं होनी चाहिए कि लोग उसे वंदन करें या उसकी प्रशंसा के गीत गाएं।
२. आत्म गवेषी जीवन : भिक्षु स्वभाव से संयत, सुव्रती और तपस्वी होता है। उसका एकमात्र लक्ष्य ज्ञान, दर्शन और चारित्र की साधना करते हुए आत्म-कल्याण करना है। भिक्षा चर्या के दौरान विधि के अनुसार उसे जो कुछ भी सहज रूप से प्राप्त हो, उसे समभाव से ग्रहण करना ही साधुत्व है।
वंदना का विज्ञान और विनय परंपरा : शांतिदूत ने धर्मसंघ की शिष्ट परंपरा और वंदना से होने वाले कर्म निर्जरा के विज्ञान पर विशेष प्रकाश डाला:
१. पुण्य का बंध और निर्जरा : व्यवहार की भूमिका में बड़ों को वंदना करना एक अत्यंत शिष्ट परंपरा है। आध्यात्मिक दृष्टि से वंदना करने से जीव के नीच गोत्र का क्षय होता है और उच्च गोत्र का बंध होता है, जिससे आत्मिक निर्जरा और पुण्य का संचय होता है।
२. वंदना की स्थापित विधि : तेरापंथ धर्मसंघ
में 'तिक्खुत्तो' के पाठ से और प्रतिक्रमण के दौरान
'इच्छामि खमासमणो' के द्वारा वंदन करने की वैज्ञानिक विधि निर्धारित है।
३. मर्यादा और प्रोटोकॉल : गुरुकुलवास में पक्खी के दिन अपने से बड़े साधु-साध्वियों को और बहिर्विहार के
समय दो समय वंदना अवश्य करनी चाहिए। छोटे साधु-साध्वियों के मन में बड़ों के प्रति अगाध विनय और सम्मान होना चाहिए। आचार्य व युवाचार्य की वंदना के समय निर्धारित प्रोटोकॉल और नियमों का पूरी जागरूकता से ध्यान रखना चाहिए। जिज्ञासा समाधान एवं सांस्कृतिक प्रस्तुति : मंगल प्रवचन के संपन्न होने पर पूज्य प्रवर ने उपस्थित चारित्रात्माओं द्वारा प्रस्तुत की गई गूढ़ तात्विक जिज्ञासाओं का समाधान किया। इसके साथ ही, चातुर्मास प्रवास स्थल पर उपस्थित साधना शिविर के शिविरार्थियों को भी अपने आराध्य के समक्ष शंकाएं रखने का अवसर मिला, जिनका पूज्य प्रवर ने अत्यंत सरल शब्दों में निवारण किया। श्रावक समाज की ओर से धीरज बैद ने सुमधुर गीत का संगान कर गुरु चरणों में अपनी कृतज्ञता व भाववंदना समर्पित की।