जिनेश्वर देव की वाणी पर पूर्ण आस्था और निःशंकता ही सम्यक्त्व का असली पिल्लर : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 24 मई, 2026

जिनेश्वर देव की वाणी पर पूर्ण आस्था और निःशंकता ही सम्यक्त्व का असली पिल्लर : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अखंड परिव्राजक, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमण जी ने सुधर्मा सभा में 'धर्म ही त्राण-शरण' विषय पर आगम के आलोक में गंभीर दार्शनिक अमृत देशना प्रदान की। आचार्यश्री ने स्पष्ट किया कि यद्यपि तीर्थंकर भी वर्तमान शरीर की मृत्यु को नहीं टाल सकते, परंतु निश्चय की भूमिका में केवल संवर और निर्जरा धर्म ही जीव को पाप कर्मों के बंधन से बचाने वाला एकमात्र सच्चा त्राण और शरण है। पाप से रक्षा : संवर और निर्जरा का सामर्थ्य : आचार्य प्रवर ने कर्म सिद्धांत की सूक्ष्मताओं को समझाते हुए मुख्य बिंदु रेखांकित किए:
१. मृत्यु अटल, धर्म असली रक्षक : इस मनुष्य जीवन के बाद भले ही किसी को मोक्ष मिल जाए, लेकिन वर्तमान शरीर की मृत्यु निश्चित है। उस लौकिक मृत्यु से धर्म या तीर्थंकर भी नहीं बचा सकते। धर्म का असली सामर्थ्य आत्मा को पाप से बचाने में है।
२. संवर से आश्रव का अंत : जैसे ही आत्मा संवर की शरण में आती है, वैसे ही आश्रव (कर्मों का आना) रुक जाता है। फिर आश्रव में यह ताकत नहीं रहती कि वह नए कर्मों का बंधन करा सके।
३. निर्जरा से पापों का क्षय : निर्जरा धर्म की शरण में आने से आत्मा में पूर्व संचित पुराने पाप कर्मों का क्षय (निर्जरण) होने लगता है। जहाँ मिथ्यात्वी जीव के संवर नहीं होता, वहीं वह भी निर्जरा धर्म की शरण लेकर इसका पूरा लाभ उठा सकता है।
सम्यक्त्व के पिल्लर और कषाय मंदता की साधना : शांतिदूत ने साधु जीवन के सुरक्षा कवच और सम्यक्त्व को पुष्ट करने के व्यावहारिक सूत्र दिए:
१. सम्यक्त्व का अकाट्य स्तंभ: व्यवहार में देव, गुरु, धर्म पर अडिग श्रद्धा और नव तत्वों को जानना ही सम्यक्त्व है। जिनेश्वर भगवान द्वारा प्ररूपित सत्य जिनवाणी पर पूर्ण आस्था होना और पूरी तरह निःशंक रहना ही सम्यक्त्व का सबसे मजबूत पिल्लर है।
२. क्षायिक सम्यक्त्व का उदय : साधु के व्रत संवर और सम्यक्त्व संवर जीवन का बहुत बड़ा सुरक्षा कवच हैं। यदि साधना के बल पर क्षयोपशामिक संवर से क्षायिक सम्यक्त्व संवर प्रकट हो जाए, तो आत्मा में पुनः कभी भी मिथ्यात्व का प्रवेश नहीं हो सकता।
३. विकारों पर नियंत्रण : चारित्र की निर्मलता के लिए क्रोध, मान, माया और लोभ रूपी कषायों को निरंतर पतला (प्रतनु) करने की साधना चलनी चाहिए। तत्व बोध में किसी भी प्रकार का पूर्वाग्रह या दुराग्रह नहीं होना चाहिए। जो बातें अहेतुगम्य (तर्क से परे) हैं, उन पर व्यर्थ तर्क-वितर्क करने के बजाय पूर्वजन्म, पुनर्जन्म और पुण्य-पाप की अवधारणा पर पूर्ण विश्वास रखना चाहिए।
साध्वी द्वय की दीक्षा के 50 वर्ष पूर्ण : अर्ध शताब्दी का मंगल आशीष:
मंगल प्रवचन के विशेष प्रसंग में आज लाडनूं की साध्वी कनक श्री जी ने सुधर्मा सभा में अपनी सुंदर भावाभिव्यक्ति दी। आज का दिन शासन के लिए अत्यंत गौरवमयी रहा जब साध्वी दिव्य प्रभा जी एवं साध्वी संघ प्रभा जी के दीक्षा पर्याय के गौरवशाली पचास वर्ष (50 वर्ष) पूर्ण हुए। इस ऐतिहासिक अर्ध शताब्दी के अवसर पर आचार्य श्री महाश्रमण जी ने दोनों साध्वियों की सम्यक्त्व साधना की सराहना करते हुए उन्हें निरंतर आत्म-कल्याण का पावन मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। साध्वी प्रमुखा श्री विश्रुत विभा जी ने भी दोनों साध्वियों के पांच दशकों के संयम काल की अनुमोदना करते हुए अपना प्रेरक उद्बोधन दिया। तत्पश्चात साध्वी दिव्य प्रभा जी व साध्वी संघ प्रभा जी ने गुरु चरणों में कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए अपनी आध्यात्मिक अनुभूतियां प्रस्तुत कीं।