गुरुवाणी/ केन्द्र
आँखें बंद होते ही यहीं छूट जाएगी संपत्ति, मौत से बचाने का सामर्थ्य किसी में नहीं : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने सुधर्मा सभा में 'वह त्राण नहीं दे सकता' विषय पर उत्तराध्ययन सूत्र के माध्यम से गंभीर अमृत देशना प्रदान की। आचार्यश्री ने संसार के भौतिक वैभव की निसारता और मृत्यु की अपरिहार्यता को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया कि इस चराचर जगत में पापकर्मों के बंधन से बचाने में केवल वीतराग धर्म ही एकमात्र सच्चा त्राण (रक्षक) और शरण बन सकता है।
वैभव की सीमा और मृत्यु का शाश्वत नियम : आचार्य प्रवर ने आगम वाङ्मय के आलोक में राजा और संपूर्ण जगत के धन का उदाहरण देते हुए मुख्य बिंदु रेखांकित किए।
१. अपर्याप्त जगत और धन : यदि किसी राजा को पूरे जगत का राज्य और सारा धन भी दे दिया जाए, तो भी उसकी तृष्णा के लिए वह अपर्याप्त रहेगा। सबसे बड़ा कटु सत्य यह है कि परलोक की यात्रा में यह धन और संसार मनुष्य को कोई त्राण (रक्षा) नहीं दे सकता।
२. आँखें बंद होने का अवसान : जब जीवन का अवसान होता है और मनुष्य की आँखें हमेशा के लिए बंद हो जाती हैं, तो उसकी जीवन भर की संचित धन-संपत्ति यहीं पीछे छूट जाती है।
३. तीर्थंकर का दृष्टांत : भगवान महावीर स्वयं तीर्थंकर थे, परंतु जब उनका आयुष्य पूर्ण हुआ तो इतनी विशाल शिष्य संपदा के होते हुए भी उन्हें काल के हाथों जाने से कोई रोक नहीं सका। जब तीर्थंकर भी शरीर छोड़ने को विवश हैं, तो सामान्य मनुष्य की क्या बिसात? चिकित्सा केवल उपचार का प्रयास कर सकती है, मृत्यु से बचाने की कोई अंतिम गारंटी नहीं दे सकती। संघ या राजा व्यवहार की भूमिका पर एक सीमा तक रक्षक हैं, पर निश्चय में काल से बचाने का सामर्थ्य किसी में नहीं है।
कषाय मुक्ति ही वास्तविक धर्म और मोक्ष का मार्ग : शांतिदूत ने कर्म बंधन से मुक्ति और जैन दर्शन के उदार, व्यापक सिद्धांतों पर विशेष प्रकाश डाला:
१. धर्म ही एकमात्र त्राण : यदि मनुष्य अहिंसा, संयम और तप रूपी वीतराग धर्म की आराधना करता है, तो वह पापकर्मों के बंधन से बच सकता है। यही साधना उसे भविष्य के दुखों से बचाती है।
२. वेश और संप्रदाय से ऊपर मोक्ष : परम पूज्य आचार्य भिक्षु के ऐतिहासिक सिद्धांत को रेखांकित करते हुए आचार्यश्री ने फरमाया कि मिथ्यात्वी यदि धर्म की करणी करता है तो वह भी देश आराधक है। जैन दर्शन का यह परम अकाट्य सिद्धांत है कि मोक्ष की प्राप्ति किसी भी वेश, लिंग, श्वेतांबर अथवा दिगंबर संप्रदाय के बंधन में नहीं बंधी है। जो भी आत्मा पूरी तरह कषाय मुक्त (क्रोध, मान, माया, लोभ से रहित) हो जाती है, वही वास्तविक धर्म को पाती है और मोक्ष की अधिकारी बनती है। अभिव्यक्तियाँ, शिविरार्थी जिज्ञासा एवं सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ : मंगल प्रवचन के उपरान्त सरदारशहर से संबंधित साध्वीवृंद और समणीवृंद ने संयुक्त रूप से गुरुदेव की अभिवंदना में सुमधुर गीत का संगान किया। शासन गौरव साध्वी राजीमती जी ने इस अवसर पर अपनी मर्मस्पर्शी भावाभिव्यक्ति दी, जबकि साध्वी देवार्यप्रभा जी व साध्वी मनोज्ञयशा जी ने संयुक्त प्रस्तुति दी। आराध्य ने सघन साधना शिविर के शिविरार्थियों की विविध जिज्ञासाओं का अत्यंत सरल शब्दों में समाधान किया। श्रावक समाज की ओर से तेरापंथी सभा कोलकाता के अध्यक्ष अजय भंसाली ने अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति दी। इसके पश्चात वृहद कोलकाता एवं दक्षिणी बंगाल ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों और कन्या मंडल की प्रशिक्षिकाओं ने सुंदर गीत एवं आध्यात्मिक प्रस्तुतियां देकर गुरु चरणों में अपनी वंदना समर्पित की।