गुरुवाणी/ केन्द्र
संसार के मोह-जाल को वही काट सकता है जिसकी तपस्या उदार और मन धीर हो : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता, महातपस्वी आचार्य श्री महाश्रमण जी ने सुधर्मा सभा में 'धीर पुरूष का सामर्थ्य' विषय की तात्विक विवेचना करते हुए गंभीर अमृत देशना प्रदान की। आचार्यश्री ने जीव की अनंतकालीन यात्रा में साधुत्व के कदम को सबसे बड़ा बताते हुए संपूर्ण चारित्रात्माओं को हर परिस्थिति में समचित्त रहने और धीरता धारण करने का पावन पाथेय दिया।
साधुत्व का भार और रोहित मत्स्य का दृष्टांत : आचार्य प्रवर ने आगम गाथाओं के आलोक में संन्यास जीवन की कसौटियों को स्पष्ट करते हुए मुख्य बिंदु रेखांकित किए।
१. ऐतिहासिक कदम : अनंत काल की आत्मिक यात्रा में साधुत्व को ग्रहण करना जीव का सबसे बड़ा कदम है। इस भार को वही वहन कर सकता है जो स्वभाव से धीर हो और जिसकी तपस्या उदार हो।
२. जर्जर जाल का उदाहरण : जिस प्रकार शक्तिशाली 'रोहित मछली' धागों से बुने जर्जरीभूत जाल को भी अपनी ताकत से छेदकर बाहर निकल जाती है, ठीक उसी प्रकार धीर पुरुष संसार के मोह-माया और काम-भोगों के जाल को काटकर भिक्षा चर्या के पथ पर आगे बढ़ जाते हैं।
३. अधीरता का संकट : साधुत्व लेने के बाद भी यदि जीवन में अधीरता (लापरवाही या आवेश) आ जाए, तो साधक पग-पग पर संकल्प-विकल्पों से घिर जाता है। ऐसा अधीर व्यक्ति आवेश में आकर कभी भी साधुपन छोड़ने जैसा आत्मघाती निर्णय ले सकता है, इसलिए संन्यास में धैर्य ही रीढ़ है।
समचित्त रहने और सेवा के विविध आयाम : शांतिदूत ने साधु चर्या के व्यावहारिक पक्षों और सेवा के विविध रूपों पर विशेष प्रकाश डाला।
१. उलाहने में भी धीरता : जीवन पथ पर कभी अपनी गलती होने पर, या बिना किसी गलती के भी यदि दूसरों से उलाहना सुनना पड़ जाए, तो भी साधक को अधीर होने के बजाय समचित्त रहना चाहिए।
२. प्रवृत्तियों पर लगाम : मन, वचन और काया जैसे ही दुष्प्रवृत्तियों की ओर बढ़ने लगें, जागरूक साधक को तुरंत उनकी लगाम खींच लेनी चाहिए और प्रमाद से बचना चाहिए।
३. परोपकार के मार्ग : पांच महाव्रतों का पालन और पाद विहार करना अपने आप में विशिष्ट तपस्या है। इसके साथ ही क्षेत्रों में विहरण कर प्रवचनों से ज्ञान देना, अध्यापन कराना, साहित्य संबंधी कार्य करना और भाई-बहनों को 'मुमुक्षु' बनने की प्रेरणा देना भी सेवा के ही उत्तम रूप हैं।
सघन साधना शिविर व ज्ञानशाला को आशीष : मंगल प्रवचन के उपरान्त पूज्य गुरुदेव ने चातुर्मास प्रवास स्थल पर आयोजित सघन साधना शिविर के शिविरार्थियों को धर्म रूपी स्कूल में गहराई से ज्ञान ग्रहण करने की मंगल प्रेरणा व आशीर्वाद प्रदान किया। इसके पश्चात आराध्य ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं का समाधान किया। कार्यक्रम के अंत में कोलकाता ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों ने अपनी सुंदर आध्यात्मिक प्रस्तुतियां देकर गुरुदेव के चरणों में भाववंदना की।