बीती हुई रात कभी लौटकर नहीं आती, हर पल को धर्म की पूंजी बनाएं  : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 20 मई, 2026

बीती हुई रात कभी लौटकर नहीं आती, हर पल को धर्म की पूंजी बनाएं : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अधिशास्ता, महातपस्वी, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने आज सुधर्मा सभा में 'जिन्दगी सफल बनाएं हम' विषय पर अत्यंत व्यावहारिक व प्रेरणादायी देशना प्रदान की। आचार्यश्री ने समय के बीतने के स्वभाव और जीवन की क्षणभंगुरता को रेखांकित करते हुए मनुष्य को धर्म संचय के प्रति निरंतर जागरूक रहने का पावन पाथेय दिया।
समय का स्वभाव और रात की अफलता : आचार्य प्रवर ने काल चक्र की गति को स्पष्ट करते हुए मुख्य बिंदु रेखांकित किए:
१. समय की अपरिवर्तनीयता: समय का मूल स्वभाव केवल बीतना (वर्तना) है। जो-जो रात्रि बीत जाती है, वह कभी लौटकर नहीं आती। चाहे कोई पापकर्म कर रहा हो या धर्मकार्य, बीते समय की पुनरावृत्ति असंभव है।
२. सफल बनाम अफल रात्रि : जो मनुष्य अपने अमूल्य समय को अधर्म, प्रमाद और सांसारिक प्रपंचों में नष्ट कर देता है, उसकी रात्रियां 'अफल' (व्यर्थ) चली जाती हैं। इसके विपरीत, जो हर क्षण का उपयोग आत्म-कल्याण में करता है, उसकी रात्रियां 'सफल' हो जाती हैं।
गृहस्थों के लिए धर्म संचय के व्यावहारिक सूत्र : शांतिदूत ने कर्मवाद और पुनर्जन्म को मानने वाले श्रावकों को चेताते हुए फरमाया कि वर्तमान में जो अनुकूलता, धन-संपत्ति और प्रतिष्ठा प्राप्त है, वह पूर्वार्जित पुण्य का उदय है। चूंकि मानव शरीर अध्रुव है और मृत्यु निरंतर निकट आ रही है, इसलिए गृहस्थों को प्रतिदिन इन नियमों का पालन करना चाहिए।
१. त्याग और तप : आत्म-शुद्धि के लिए प्रतिदिन नवकारसी और पौरसी का प्रत्याख्यान (त्याग) अवश्य करना चाहिए।
२. दैनिक स्वाध्याय व जप : रोज नवकार महामंत्र की माला का जप करने और कम से कम एक सामायिक करने का संकल्प लें, जिससे आध्यात्मिक ऊर्जा का संचय हो सके।
चारित्रात्माओं को साधना की गहराई का निर्देश : एकादशमाधिशास्ता ने संतों, साध्वियों और समणियों के लिए दैनिक चर्या की शुद्धि पर विशेष बल दिया।
१. गाथाओं का चितारना: रात्रि के समय सजगतापूर्वक दो-सौ या तीन-सौ गाथाओं का चितारना (स्मरण) निरंतर गतिमान रहना चाहिए।
२. भावपूर्वक क्रियाएं : रात्रि के समय केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि जप, ध्यान, दैनिक प्रतिक्रमण, अर्हत् वंदना और आलोयणा को अत्यंत भावपूर्वक संपन्न करना चाहिए।
जिज्ञासा समाधान एवं वंदना : मंगल प्रवचन के संपन्न होने पर पूज्य प्रवर ने उपस्थित चारित्रात्माओं द्वारा प्रस्तुत की गई विविध तात्विक जिज्ञासाओं का अत्यंत सरल शब्दों में समाधान किया।
आचार्यश्री की अभ्यर्थना और अभिवंदना के क्रम में मुनि प्रीतकुमार जी ने विषय के संदर्भ में अपने सुंदर प्रेरक विचार प्रस्तुत किए।