गुरुवाणी/ केन्द्र
जब मौत से कोई मित्रता का अनुबंध नहीं, तो फिर धर्म को कल पर क्यों टालना? : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अखंड परिव्राजक, शांतिदूत आचार्य श्री महाश्रमण जी ने सुधर्मा सभा में 'कल की इच्छा कौन करे?' विषय पर उत्तराध्ययन सूत्र के माध्यम से गंभीर अमृत देशना प्रदान की। आचार्यश्री ने काल द्रव्य की अनंतता और जीवन की क्षणभंगुरता को रेखांकित करते हुए संपूर्ण चतुर्विध धर्मसंघ को आलस्य का त्याग कर तत्परता से धर्म संचय करने का पावन पाथेय दिया।
काल की अनंतता और कल का भ्रम:
आचार्य प्रवर ने काल चक्र के स्वरूप और मानवीय भूलों को स्पष्ट करते हुए मुख्य बिंदु रेखांकित किए:
१. स्वल्प वर्तमान : अनंत काल अतीत की सीमा में बीत चुका है और अनंत काल ही भविष्य (अनागत) की गोद में है। हमारे पास जो वर्तमान है, वह बहुत छोटा (स्वल्प) है।
२. कल पर कार्य कौन छोड़े?: आगमकार के अनुसार केवल तीन ही व्यक्ति किसी धार्मिक या आवश्यक कार्य को कल पर टाल सकते हैं—१. जिसकी मृत्यु से गहरी दोस्ती हो, २. जो मृत्यु से भी तेज़ दौड़कर बच सकता हो, और ३. जो स्वयं अमर हो। चूंकि धरती पर ऐसा कोई मनुष्य नहीं है, इसलिए अच्छे कार्यों को कल पर छोड़ना भारी भूल है।
आत्मा ही सबसे बड़ा मित्र : पूज्य गुरुदेव ने सूक्त 'अप्पा मित्त ममितं च, दुप्पट्ठिय सुपट्ठियो' की व्याख्या करते हुए आत्मा और सांसारिक व्यवहार के व्यावहारिक सूत्र दिए:
१. आंतरिक मित्रता : मनुष्य दुनिया में मित्र ढूंढता है, लेकिन जो आत्मा सद्प्रवृत्तियों में लगी है, वही उसकी सबसे बड़ी मित्र और कल्याणकारी है।
२. अर्हत् वंदना से निर्जरा : पूर्व रात्रि और पश्चिम रात्रि दोनों समय होने वाली अर्हत् वंदना का संगान जीवन में कर्मों की निर्जरा का एक सशक्त साधन बनता है।
३. परिस्थितियों से सामंजस्य : स्थूल व्यवहार में यदि जीवन में कोई गंभीर कठिनाई, रोग या बुढ़ापा आ जाए, तो मनुष्य को उनके साथ भी मानसिक रूप से मित्रता कर लेनी चाहिए ताकि उसका आत्मिक मनोबल हमेशा उच्च बना रहे।
ज्ञान दान और समय प्रबंधन का महत्व : शांतिदूत ने जीवन को सफल बनाने के लिए दान और तत्परता की महत्ता पर विशेष प्रकाश डाला:
१. ज्ञान की अनूठी विशेषता : समाज में भौतिक वस्तुओं का दान तो श्रेष्ठ है ही, परंतु विद्या (ज्ञान) का दान भी उतना ही अनूठा है। विद्या का ज्ञान जितना दूसरों को बांटा जाता है, स्वयं के ज्ञान में उतनी ही वृद्धि होती है।
२. सजगतापूर्वक कार्य : यदि समय प्रबंधन या किसी विशेष मजबूरी के कारण कोई कार्य कल के लिए निर्धारित हो, तो बात अलग है, अन्यथा आलस्य के कारण किसी भी शुभ कार्य को कल पर नहीं छोड़ना चाहिए।
संस्कार निर्माण शिविर के बच्चों को मिला पाथेय: आज मुख्य प्रवचन कार्यक्रम के दौरान संस्कार निर्माण शिविर के अनेक संभागी शिविरार्थी बालक-बालिकाएं गुरुदेव की पावन सन्निधि में उपस्थित हुए। शिविरार्थी सारंग बोथरा, लक्षिता बोथरा और दिवांश सेठिया ने जहाँ शिविर के अपने सुंदर अनुभवों की अभिव्यक्ति दी, वहीं राजेश बाफना ने भी अपने विचार रखे।
शिविर के बच्चों ने सुमधुर गीतों का संगान कर आराध्य के चरणों में वंदना की। इस अवसर पर मुख्य मुनि श्री ने सभी संभागियों को जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा दी और आचार्य श्री ने बच्चों को अच्छे संस्कारों के विकास का पावन आशीर्वाद प्रदान किया।