धर्म है उत्कृष्ट मंगल

स्वाध्याय

-आचार्यश्री महाश्रमण

धर्म है उत्कृष्ट मंगल

जो मनस्वी और कार्यार्थी व्यक्ति होता है उसको सब स्थितियां सहनी पड़ती हैं। कहीं गया, सोने के लिए अच्छा स्थान मिल गया, उसका उपयोग किया जा सकता है, कहीं सोने का अच्छा स्थान न मिला तो वहीं संतोष कर लिया। कहीं खाने के लिए अच्छा भोजन मिल गया तो भी संतोष, कहीं अच्छा भोजन न मिला तो भी संतोष। कहीं अच्छे कपड़े भेंट में आ गए, मालाएं पहना दी गई, शाल्यार्पण कर दिया गया तो भी ठीक है, कहीं पूरा सम्मान न मिला तो भी ठीक है। यानी ऐसी स्थितियों में अपने आपको सम रखने की जरूरत है। साधना करता हुआ जो व्यक्ति चलता है, वह काम में आगे बढ़ सकता है और मेरा तो ऐसा लगभग विश्वास है कि जो व्यक्ति सच्चे दिल से सेवा करता है, सच्चे दिल से काम करता है, कभी-न-कभी समाज अवश्य उसका मूल्यांकन करता है और मुझे वह पक्ति इस प्रसंग में भी याद आती है कि 'देर भले, अंधेर नहीं।'
कार्यकर्त्ता के मन में कुछ समता की साधना होनी चाहिए कि सब स्थितियों को झेलते हुए भी वह अपनी सेवाएं देता रहे। कार्यकर्त्ता का यह छठा मौलिक गुण है-परिश्रमशीलता।
कार्यकर्त्ता में एक मौलिक गुण होना चाहिए-विनम्रता का। कार्यकर्त्ता सबको साथ लेकर चले। विरोध में भी विवाद को न उठने दे। सामंजस्य की भावना हो। जब अमेरिका के लोगों ने अपने देश को आजाद कराने का फैसला लिया, तो मुक्ति सेना का किसी को मुखिया, सेनापति बनाना था, मीटिंग बुलाई गई, उसमें बड़े-बड़े व्यक्ति थे, विद्वान्, युद्ध कुशल। उनमें एक था जार्ज वाशिंगटन। वाशिंगटन की अपेक्षा और अन्य लोग काफी बड़े-बड़े थे पर सबने मिलकर जार्ज वाशिंगटन को मुक्ति सेना का मुखिया चुना। क्यों? बताया गया कि उसका मुख्य कारण यह था कि जार्ज वाशिंगटन एक शांत प्रकृति का आदमी था, निरभिमानी, विनम्र स्वभावी, संतुलित प्रकृति का आदमी था। उसको लेकर किसी के मन में कोई वैमनस्य का भाव नहीं था, सबके मन में उसके प्रति सद्भावना थी।
जब दूसरों के मन में ईष्या होती है, तो वहां मुखिया बनाने में कई कठिनाइयां होती हैं, पर जो अजातशत्रु व्यक्ति हो, उसको सब चाहते हों तो उसको मुखिया बनाने में, उसका चयन करने में कोई खास दिक्कत नहीं आती है। तो सबने मिलकर जार्ज वाशिंगटन को अपनी मुक्ति सेना का मुखिया बना लिया और अमेरिका के स्वतंत्र होने के बाद देश का प्रथम राष्ट्रपति भी जार्ज वाशिंगटन को चुना गया।
पदाधिकारी अपने आप में बड़ा कुशल है, काम करने में सक्षम है, पर सबको साथ लेकर चलने की क्षमता नहीं है तो भी वह व्यक्ति अपने आप में पूर्ण सफल नहीं हो सकता। तो एक अच्छे कार्यकर्त्ता में सबको साथ लेकर चलने की भी ताकत होनी चाहिए। जिसमें विनम्रता होती है, अनेकांत शैली होती है और सामंजस्य भावना होती है वह सफल होता है। अतः कार्यकर्त्ता का सातवां मौलिक गुण है– विनम्रता।
ये सात गुण जिस कार्यकर्त्ता में आ जाते हैं, वह एक सफल कार्यकर्त्ता बन सकता है। कार्यकर्त्ता में ऐसी मौलिक विशेषताएं होती हैं तो निःसंदेह हमारा समाज तेजस्वी, गौरवशाली एवं एक आदर्श समाज बन सकता है। तेरापन्थ का हर कार्यकर्ता श्रावक + कार्यकर्त्ता हो। उसमें श्रावकत्व भी बोलना चाहिए।
संगठन के सूत्र
विज्ञान की एक शाखा है वनस्पति विज्ञान। उसके अनुसार वनस्पतियों में इन्टर एक्शन (पारस्परिक प्रभाव) होता है। एक वनस्पति दूसरी वनस्पति को प्रभावित करती है। वनस्पति के इन्टर एक्शन की चार क्रियाएं संगठन की दृष्टि से मननीय हैं। वे इस प्रकार हैं-
सिम्बायोसिस् (सहजीवन) एक वनस्पति अपने शरीर से ऐसे पदार्थों को छोड़ती है जो दूसरी वनस्पति को पोषण प्रदान करते हैं। यह पारस्परिक सहयोग का संबंध है।
विकास का एक सूत्र दिया गया- स्ट्रगल इज लाइफ (संघर्ष जीवन है)। एक दृष्टि से यह सच भी लगता है। प्रसिद्ध जैन आचार्यश्री उमास्वाति ने हजारों वर्ष पहले जीवन-निर्वाह का सूत्र दिया- परस्परोपग्रहो जीवानाम्। पारस्परिक उपकार या सहयोग से प्राणियों का जीवन चलता है। जीवन के कुछ पहलुओं में एक व्यक्ति सहयोग देता और कुछ पहलुओं में वह सहयोग लेता है। शिष्य आचार्य की सेवा करता है, उनका विनय करता है। आचार्य शिष्य को ज्ञान देते हैं, उसका मार्ग दर्शन करते हैं, उसे वात्सल्य देते हैं। यह गुरु, शिष्य का पारस्परिक उपकार है। इसी प्रकार स्वामी-सेवक, पिता-पुत्र, माता-पुत्र, भाई-भाई, पति-पत्नी, मित्र-मित्र आदि के यथोचित पारस्परिक सहयोग के संबंध होते हैं। समुचित पारस्परिक सहयोग से संगठन को वह प्राण-ऊर्जा मिलती है जो उसे दीर्घजीवी बनाने में कामयाब सिद्ध होती है।