श्रमण महावीर

स्वाध्याय

-आचार्यश्री महाप्रज्ञ

श्रमण महावीर

'कहां जा रहे हो?'
'भगवान महावीर की उपासना करने जा रहा हूं।'
'क्या मैं भी जा सकता हूं?'
'किसी के लिए प्रवेश निषिद्ध नहीं है।'
अर्जुन सुदर्शन के साथ भगवान के पास पहुंचा। आरक्षिकों ने श्रेणिक को सूचना दी कि पाप शांत हो गया है। राजपथ निर्विघ्न है। निरंकुश हाथी पर अंकुश का नियंत्रण है। अर्जुन सुदर्शन के साथ भगवान महावीर के पास चला गया है। राजकीय घोषणा के साथ राजपथ का आवागमन खुल गया।
भगवान के कण-कण में अहिंसा का प्रवाह था। मैत्री और प्रेम की अजस्र धाराएं बह रही थीं। उसमें स्नात व्यक्ति की क्रूरता धुल जाती थी। अर्जुन का मन मृदुता का स्रोत बन गया।
मनुष्य के अन्तःकरण में कृष्ण और शुक्ल-दोनों पक्ष होते हैं। जिनकी चेतना तामसिक होती है, वे प्रकाश पर तमस् का ढक्कन चढ़ा देते हैं। जिनकी चेतना आलोकित होती है, वे प्रकाश को उभार तमस् को विलीन कर देते हैं। भगवान ने अर्जुन के अन्तःकरण को आलोक से भर दिया। उसके मन में समता की दीपशिखा प्रज्वलित हो गई। वह मुनि बन गया।
कल का हत्यारा आज का मुनि-यह नाटकीय परिवर्तन जनता के गले कैसे उतर सकता है? हर आदमी उस सत्य को नहीं जानता कि मनुष्य के जीवन में बड़े परिवर्तन नाटकीय ढंग से ही होते हैं। असाधारण घटना साधरण ढंग से नहीं हो सकती। साधारण आदमी असाधारण घटना को एक क्षण में पकड़ भी नहीं पाता। अर्जुन से आतंकित जनता उसके मुनित्व को स्वीकार नहीं कर सकी।
अर्जुन ने भगवान के पास समता का मंत्र पढ़ा। उसकी समता प्रखर हो गई। मान-अपमान, लाभ-अलाभ, जीवन-मृत्यु और सुख-दुःख में तटस्थ रहना उसे प्राप्त हो गया।
कुछ दिनों बाद मुनि अर्जुन भिक्षा के लिए राजगृह में गया। घर-घर से आवाजें आने लगीं-इसने मेरे पिता को मारा है, भाई को मारा है, पुत्र को मारा है, माता को मारा है, पत्नी को मारा है, मित्र को मारा है। कहीं गालियां, कहीं व्यंग्य, कहीं तर्जना और कहीं प्रताड़ना। अर्जुन देख रहा है-यह कृत की प्रतिक्रिया है, अतीत के अनाचरण का प्रायश्चित्त है। उसे यदि रोटी मिलती है तो पानी नहीं मिलता और यदि पानी मिलता है तो रोटी नहीं मिलती। पर उसका मन न रोटी में उलझता है और न पानी में। उसका मन समता में उलझकर सदा के लिए सुलझ गया। उसके समत्व की निष्ठा ने जनता का आक्रोश सद्भावना में बदल दिया। अहिंसा ने हिंसा का विष धो डाला।
३. सहिष्णुता का आयाम
मेतार्य जन्मना चाण्डाल थे। वे भगवान महावीर के संघ में दीक्षित हुए। उनका मुनि-जीवन ज्ञान और समता की साधना से प्रदीप्त हो उठा। उनके अन्तर की ज्योति जगमगा उठी। वे संघ की सीमा से मुक्त हो गए। अब वे अकेले रहकर साधना करने लगे। एक बार वे राजगृह में आए। स्वर्णकार के घर भिक्षा लेने पहुंचे। स्वर्णकार उन्हें देख हर्ष-विभोर हो उठा। वह वंदना कर बोला- 'श्रमण! आप यहीं ठहरें। मैं दो क्षण में यह देखकर आ रहा हूं कि रसोई बनी है या नहीं?' स्वर्णकार भीतर घर में गया। मुनि वहीं खड़े रहे। स्वर्णकार की दुकान में क्रौंच पक्षी का युगल बैठा था।
स्वर्णकार के जाते ही वह आगे बढ़ा और दुकान में पड़े स्वर्णयवों को निगल गया।
स्वर्णकार मुनि को घर में ले जाने आया। उसने देखा, स्वर्णयव लुप्त हैं। वह स्तब्ध रह गया। उसके मन में आवेश उतर आया। उसने स्वर्णयवों के विषय में मुनि से पूछा। मुनि मौन रहे। स्वर्णकार का आवेश बढ गया। वह बोला- 'श्रमण ! मैं अभी आपके सामने स्वर्णयव यहां छोड़कर गया। कुछ ही क्षणों में मैं यहां लौट आया। इस बीच कोई दूसरा व्यक्ति यहां आया नहीं। मेरे स्वर्णयवों के लुप्त होने के उत्तरदायी आपके सिवाय दूसरा कौन हो सकता है?' मुनि अब भी मौन रहे।