स्वाध्याय
संबोधि
मातृका ध्यान
आचार्य शुभचन्द्र ने लिखा है-'मातृका का ध्यान करने वाला पुरुष नाभिमंडल पर स्थित सोलह दल के कमल में प्रत्येक दल पर क्रम से फिरती हुई स्वरावली का अर्थात् 'अ आ इ ई उ ऊ ऋ लु लू
ए ऐ ओ औ अं अः इन स्वरों का चिंतन करे। तत्पश्चात् ध्यानी अपने हृदय स्थान पर कर्णिका सहित चौबीस पत्रों के कमल का चिंतन करके उसकी कर्णिका तथा पत्रों में क ख ग घ ङ च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण त थ द ध न प फ ब भ मइन पच्चीस अक्षरों का ध्यान करे। तत्पश्चात् आठ पत्रों से विभूषित मुख-कमल के प्रत्येक पत्र पर भ्रमण करते हुए य र ल व श ष स ह-इन आठ वर्णों का ध्यान करे!'
मातृका ध्यान का फल
इस प्रकार प्रसिद्ध वर्ण-मातृका का निरन्तर ध्यान करता हुआ योगी भ्रम-रहित होकर, श्रुतज्ञान रूपी समुद्र के पार को (उत्तर-तट को) प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार ध्यान करने वाला मुनि श्रुतकेवली हो सकता है। ध्यान करने वाला पुरुष कमल के पत्र और कर्णिका के मध्य में अनादि संसिद्ध (पूर्वोक्त ४९) अक्षरों का ध्यान करता हुआ कितने ही काल में नष्टादि वस्तु संबंधी ज्ञान को प्राप्त करता है। इस वर्णमातृका के जाप से योगी क्षयरोग, अरुचि, अग्निमंदता कुष्ठ, उदररोग, कास तथा श्वास आदि रोगों को जीतता है और वचनसिद्धता तथा महान् पुरुषों से पूजा तथा परलोक में उत्तम पुरुषों से प्राप्त की हुई श्रेष्ठ गति को प्राप्त होता है।'
मंत्र
वर्ण, मातृका, बीजाक्षर और मंत्रों की पृथक् पृथक् रूप में जब हम चर्चा करते हैं तब मंत्र की परिभाषा में कुछ भिन्नता हो जाती है। यों तो सभी वर्ण बीजाक्षर मंत्र हैं, शक्ति सम्पन्न हैं और प्रयोक्ता को अपनी शक्ति का परिचय देते हैं, किन्तु जब मंत्र को पृथक् करते हैं उनकी परिभाषा इस रूप में उपलब्ध होती है-'दस से बीस वर्षों के समूह को मंत्र कहा जाता है।' 'इष्टदेव का अनुग्रहविशेष ही मंत्र कहलाता है। देवता के सूक्ष्म शरीर को ही मंत्र कहते हैं। सर जानुवुडरेफ ने शिव, शक्ति और आत्मा के ऐक्यरूप को मंत्र कहा है। 'चित्तं मंत्रं'- शिवसूत्र विमर्शिनी में चित्त को मंत्र कहा है। तंत्र में शक्ति को मंत्र कहा गया है-
'मननात् सर्वभावनां, त्राणात् संसारसागरात्।
मन्त्ररूपाहि तच्छक्तिर्मननत्राणरूपिणी।।
समस्त भावों के मनन और समस्त जगत् के त्राणस्वरूप होने के कारण वह मंत्र रूप शक्ति ही है।'
मनन और त्राणधर्मात्मक जो वर्णसमुदाय होता है उसे मंत्र कहा गया है। डा. शिवशंकर अवस्थी ने मनन और त्राण की तांत्रिक परिभाषा करते हुए लिखा है-'परनाद या परस्फुरणा का परामर्श ही मनन है, मनन पर शक्ति के महान् वैभव की अनुभूति है-उसके परमैश्वर्य का उपयोग है। अपूर्णता अथवा संकोचमय भेदात्मक संसार के प्रशमन को रक्षा अथवा त्राण कहते हैं। इस प्रकार शक्ति के वैभव या विकासदशा में मननयुक्त तथा संकोच या सांसारिक अवस्था में त्राणमयी विश्वरूप विकल्प को कवलित कर लेने वाली अनुभूति ही मंत्र है।'
मंत्रों के स्वल्पाक्षरों की असीमित शक्ति का रहस्य अब स्पष्ट है। प्रत्येक शब्द अपनी ध्वनि से प्रकंपन पैदा करता है और उन प्रकंपनों से जगत् प्रभावित होता है। वह शक्ति निर्माणात्मक और विध्वंसात्मक दोनों रूपों में विद्यमान है। यह प्रयोक्ता पर निर्भर है कि वह कैसा प्रयोग करता है। विद्वेष, उच्चाटन, वशीकरण सम्मोहात्मक आदि सभी प्रकार की शक्तियां शब्दों में निहित है और यह भी स्पष्ट है कि जो शब्दशक्ति के द्वारा दूसरों का अहित तथा अनिष्ट करता है, अंततोगत्वा वह स्वयं के महापतन का पथ तैयार करता है। इसलिए प्रशस्त साधकों को इनसे बचने की सूचना सर्वप्रथम दी जाती है। मानसिक पवित्रता साधना की आधारभूमि है। इसके अभाव में जीवन की उलझनें न्यून नहीं होतीं और साधक के उत्पथ पर जाने की संभावना भी नकारी नहीं जाती।