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करुणा के स्रोत आचार्यश्री महाश्रमण
परमपूज्य आचार्य श्री महाश्रमणजी में उदारता, महानता और श्रेष्ठता का समवाय है। ये विरल आध्यात्मिक गुण भीतर से पैदा होते हैं। भीतर में क्षायोपशमिक भाव है और वह जब प्रकृष्ट बनता है तब मनुष्य ऐसे दैविक गुणों से ओत-प्रोत हो जाता है। आचार्य श्री की विचारधारा और आभामण्डल में बहुत पवित्रता है। इससे वे चुम्बकीय आकर्षण के व्यक्तित्व बन रहे हैं। हजारों-लाखों व्यक्तियों को बांधे रखना चामत्कारिक व्यक्तित्व का ही करिश्मा है। वे देहरी दीपक के समान सम्मानार्ह बन रहे हैं।
इतिहास प्रसिद्ध घटना है कि पंजाब केसरी राजा रणजीत सिंह परोपकारपरायण थे। अपराध करने वाले को भी पुरस्कार देकर महानता का दर्शन प्रस्तुत करते थे। आचार्य श्री महाश्रमणजी इस माहात्म्य शैली को विकसित कर रहे हैं। मृदु अनुशासन के द्वारा वे शिष्यों में भावात्मक परिवर्तन लाना चाहते हैं। यह अहिंसक शक्ति है और इसका स्थायी प्रभाव है। अपराध वृत्ति को बदलने का यह श्रेष्ठ मार्ग है। इस मार्ग पर चलने के लिये प्रचुर धैर्य और क्षमा की शक्ति चाहिये। यह गौरवशाली इतिहास रचने का सुन्दर प्रकल्प है। हिंसा पर अहिंसा की विजय महापुरुषों की अद्भुत सोच है। अहिंसा का दर्शन मानव मन में आश्चर्य पैदा करता है। अहिंसा का उपदेश और अहिंसा का जीवन दोनों ही महत्त्वपूर्ण हैं।
महाभारत का एक प्रसंग है। भीम ने दुर्योधन आदि सौ कौरवों को मार डाला। अन्त में दुर्योधन को मारा। मरणासन्न दुर्योधन ने अश्वत्थामा से कहा - तुम पाण्डवों को मार डालो तो मेरी मृत्यु सुखपूर्वक हो जाये। इधर युद्ध में अश्वत्थामा के पिता द्रोणाचार्य द्रौपदी के भाई धृष्टद्युम्न के हाथों वीर गति को प्राप्त हो गये।
इससे अश्वत्थामा प्रतिहिंसा से भर गये। वे रात्रि के समय पाण्डवों के शिविर में घुस गये। वहां द्रौपदी के पांच पुत्र सो रहे थे। क्रोधान्ध अश्वत्थामा ने द्रौपदी के पांचों पुत्रों को मार डाला। अपने पुत्रों को मृत देखकर द्रौपदी विलाप करने लगी। पांडवों के हृदय प्रतिशोध की ज्वाला में जलने लगे। अर्जुन ने अश्वत्थामा को पकड़ लिया। उसने द्रौपदी से कहा - 'तुम्हारा अपराध सामने खड़ा है। तुम जो बोलोगी, वही दण्ड इसे दिया जायेगा।' हालांकि द्रौपदी अपने पुत्रों के अवसान से दुःख में डूबी हुई थीं और क्रोध भी कम नहीं था। किन्तु अश्वत्थामा को देखकर उनके हृदय में मां की ममता उमड़ आयी। उनका क्रोध शान्त हो गया। वे बोलीं - 'आर्य! इन्हें छोड़ दीजिये। इनके प्राण लेने से मुझे मेरे पुत्र वापस नहीं मिल जायेंगे।' द्रौपदी के उत्तर से हैरान अर्जुन ने कहा - 'यह तुम्हारे पुत्रों का हत्यारा है। क्या इसे दण्ड देने से तुम्हें शान्ति नहीं मिलेगी?' तब द्रौपदी बोलीं - 'नहीं, आर्य! ये मेरे अपराधी अवश्य हैं, किन्तु किसी मां के बेटे भी हैं। जिस तरह मैं अपने पुत्रों की मृत्यु से शोक सागर में डूबी हूं, उसी प्रकार इनके मरने से गुरु-पत्नी को बहुत चोट पहुंचेगी। मैं मां हूं और इसलिये किसी दूसरी मां को दुःखी करना नहीं चाहती। मैं इन्हें क्षमा करती हूं और आप लोग भी ऐसा ही करें।' पाण्डवों ने अश्वत्थामा को छोड़ दिया। क्षमा पाकर उन्हें घोर पश्चाताप हुआ। वे सिर झुकाये वहां से चले गये।
दंड, अपराधी में विपरीत सोच भरता है, जबकि क्षमा से उसे पछतावा होता है और वह सुधार की राह पर बढ़ता है। अपने स्वभाव में क्षमा को स्थान देना अहिंसक चेतना का महानतम निदर्शन है। यह अहिंसा कभी-कभी अलौकिक प्रेम पैदा करती है।
आचार्य श्री महाश्रमणजी का जीवन एक सशक्त प्रेरणा है और किसी ग्रंथ से कम नहीं है। उन्हें दो महान और प्रतापी आचार्यों से संबोध प्राप्त हुआ है तथा यह उनके जीवन का परम सौभाग्य है। आचार्य श्री तुलसी और महाप्रज्ञ का युग और जोड़ी में विलक्षणता के दर्शन होते थे। ऐसा युग और ऐसी जोड़ी न भूतो और न भविष्यति कहा जाये तो कोई अतिशयोक्ति नहीं लगेगी। व्यक्ति निर्माण और ग्रंथ निर्माण की कला उनमें बेजोड़ थी। सामान्य जन से लेकर राष्ट्राध्यक्ष तक उन्हें श्रद्धा से याद करते रहेंगे। वे अपने आत्म गौरव और आत्म कर्तृत्व से पुरस्कृत हैं। आचार्य महाश्रमणजी उनकी प्राणवान कृति हैं। इनमें सहज सौन्दर्य है। आत्मोपासना की विरल वृत्ति ने उन्हें सौन्दर्यमय बना दिया है। सत्य और शिव की साधना करने वाला सौन्दर्य का देवता बन जाता है। वे अनुभव के स्वर में कहते हैं—'सच्चाई महान धर्म है। झूठ न रहे तो दुनिया कितनी सुखी बन सकती है। सत्य बोलने में कठिनाई है तो व्यक्ति मौन भले रह जाये, किन्तु असत्य संभाषण से यथासंभव बचने का प्रयास करना चाहिये।'