युवा पीढ़ी अपनी शक्ति और ज्ञान का राष्ट्र व संघ हित में करें सदुपयोग : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 31 मई, 2026

युवा पीढ़ी अपनी शक्ति और ज्ञान का राष्ट्र व संघ हित में करें सदुपयोग : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, महातपस्वी, युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी ने सुधर्मा सभा में 'ज्यादा तेज न चलें' विषय पर उत्तराध्ययन सूत्र के माध्यम से पावन प्रतिबोध प्रदान किया। आचार्यश्री ने सुश्रमण चर्या की सूक्ष्मताओं को समझाते हुए विहार, गोचरी और दैनिक व्यवहार में अहिंसा व चित्त की स्थिरता बनाए रखने के कड़े सूत्र दिए। धीमी गति और शांत भाव : ईर्या समिति का असली मर्म : आचार्य प्रवर ने पदयात्रा और अहिंसा के अंतर्संबंधों को स्पष्ट करते हुए मुख्य बिंदु रेखांकित किए।
१. तेज चलने से जीव विराधना: सामान्य परिस्थितियों में साधु का बहुत द्रुत (तेज) गति से चलना मर्यादा के अनुकूल नहीं है। तेज चलने से मार्ग के सूक्ष्म जीवों की विराधना (हिंसा) होने की संभावना बढ़ जाती है, जो साधक को 'पाप श्रमण' की श्रेणी में खड़ा कर सकती है। पदयात्रा में ईर्या समिति की जितनी श्रेष्ठ पालना पैरों से चलने में होती है, वह वाहनों के प्रयोग में कतई संभव नहीं है।
२. गुरु तुलसी का जीवंत आदर्श: शांतिदूत ने फरमाया कि परम पूज्य आचार्य श्री तुलसी विहार करते समय पूरी जागरूकता रखते थे। वे चलते समय कभी वार्तालाप नहीं करते थे और हमेशा शांत व मंद गति से कदम बढ़ाते थे। साधु की मंद गति अहिंसा, संयम और चित्त की स्थिरता में परम सहयोगी होती है।
प्रमाद का त्याग और चंड वृत्ति से बचने की सीख : आगमिक गाथाओं के आलोक में पूज्य प्रवर ने साधकों को आत्म-निरीक्षण की प्रेरणा दी। १. लांघने का दोष : साधु को मार्ग में सोते हुए किसी भी बड़े प्राणी, जैसे कुत्ता या सोते हुए बच्चे के ऊपर से उल्लंघन करके (लांघकर) नहीं जाना चाहिए। ऐसा करने वाला साधु प्रमादी माना जाता है। इसके साथ ही, भोजन करने, बात करने और वस्त्रों के प्रतिलेखन में बार-बार प्रमाद करना साधुत्व को दूषित करता है।
२. क्रोध पर नियंत्रण : जो साधु स्वभाव से 'चंड' (उग्र) होता है और गुस्से में आकर मर्यादा से अधिक बोलता है, वह सुश्रमण नहीं कहला सकता। जीवन में हमेशा शांति और समता का भाव रखने का प्रयास होना चाहिए।
42 की तपस्या का प्रत्याख्यान और किशोर अधिवेशन : सुधर्मा सभा शासन के गौरवमयी प्रसंगों और युवाओं के उत्साह की साक्षी बनी।
१. तपस्वी को वंदन : मंगल प्रवचन के उपरांत मुनि नमिकुमार जी ने पूज्य प्रवर के सम्मुख 42 उपवास (42 की तपस्या) का प्रत्याख्यान (पचक्खान) ग्रहण किया, जिस पर आचार्यश्री ने उन्हें हर्षोल्लास के साथ पावन मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।
२. 21वाँ राष्ट्रीय किशोर अधिवेशन : अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद के तत्वाधान में तेरापंथ किशोर मंडल के 21वें राष्ट्रीय अधिवेशन का भव्य मंचीय उपक्रम रहा। इस अवसर पर अभातेयुप के राष्ट्रीय अध्यक्ष पवन माण्डोत, महामंत्री सौरभ पटावरी और किशोर मंडल के राष्ट्रीय प्रभारी मयंक धाकड़ ने अपनी सारगर्भित भावाभिव्यक्ति दी। अधिवेशन में किशोरों ने सुमधुर गीतों का संगान किया और सुंदर नाट्य प्रस्तुति दी।
३. किशोरों को पावन पाथेय : आचार्य प्रवर ने किशोरों को आशीर्वाद देते हुए कहा कि यह पीढ़ी सुसंस्कारी बनी रहे, इसके लिए किशोरों पर ध्यान देना बेहद महत्वपूर्ण है। युवा पीढ़ी 'तेरापंथ प्रबोध' के माध्यम से आचार्य भिक्षु के जीवन वृत्त को समझे और संघ की सेवा में अपनी शक्ति व ज्ञान का सर्वश्रेष्ठ विनियोग करे। 'किशोर दिवस' के माध्यम से देश भर के अन्य किशोरों को भी इस आध्यात्मिक धारा से जोड़ने का प्रयास होना चाहिए।