गुरुवाणी/ केन्द्र
शांत हो चुके विवाद में रस लेना और बेवजह जिद-कदाग्रह करना है 'पाप श्रमण': आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अखंड परिव्राजक आचार्य श्री महाश्रमण जी ने सुधर्मा सभा में 'विवाद की उदीरणामत करो' विषय पर आगम के आलोक में गहरा व्यवहारिक प्रशिक्षण प्रदान किया। आचार्यश्री ने फरमाया कि जहां सामूहिक जीवन और संघ बद्ध साधना होती है, वहां मतभेदों की संभावना रहती है; परंतु मंद कषाय और कुशल व्यवहार के बल पर ही संघ में पूर्ण शांति और समाधि बनी रह सकती है।
शांत विवाद को उकेरना मर्यादा के विपरीत : आचार्य प्रवर ने आत्मिक समाधि और कलह-मुक्ति के सिद्धांतों को समझाते हुए मुख्य बिंदु रेखांकित किए:
१. कलह में रस लेना दोष : आगम में वर्णित पाप श्रमण के लक्षणों पर प्रहार करते हुए पूज्य प्रवर ने फरमाया कि जो व्यक्ति शांत हो चुकी बातों या पुराने विवादों को दोबारा उकेरता है, वह 'पाप श्रमण' कहलाता है। अनावश्यक जिद, कदाग्रह और कलह में अपनी बुद्धि लगाना आत्म-कल्याण के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है।
२. चित्त की समाधि स्वयं के पास : हर मनुष्य की समाधि उसके स्वयं के भीतर होती है। यदि हमारा अपना चित्त शांत और स्थिर है, तो संसार का कोई भी दूसरा व्यक्ति हमारी समाधि को भंग करने में निमित्त नहीं बन सकता।
रूखे और अस्वस्थ संतों की सेवा ही असली सदाचार : शांतिदूत ने गुरुकुलवास में सामंजस्य स्थापित करने और सेवा धर्म का मर्म सिखाया:
१. कठिनाई सहकर भी करें सेवा : जो साधु-साध्वी व्यवहार और प्रकृति से थोड़े रूखे हैं, उन्हें भी अपने पास स्थान देना और उनके साथ सामंजस्य बिठाना एक महान सेवा है।
२.सेवा की कमी से न हो असमाधि : संघ के वृद्ध, अस्वस्थ अथवा बीमार संत-साध्वियों की यथायोग्य सेवा-शुश्रूषा करना हर साधक का परम कर्तव्य है। हमारी सेवा में कोई ऐसी कमी नहीं रहनी चाहिए जिससे किसी बीमार संत को असमाधि (कष्ट) पहुँचे। बीमारों को आत्मिक सुख पहुँचाना ही धर्म है।
न्यारा में सफलता के तीन दिव्य महासूत्र : मुख्य गुरुकुलवास से अलग (न्यारा) क्षेत्रों में विचरने वाली चारित्रात्माओं को आचार्यश्री ने सफलता का पाथेय दिया।
१. आचार और मर्यादा के प्रति सजगता : गोचरी-पानी (आहार) और दैनिक चर्या में मर्यादा के प्रति पूर्ण जागरूकता ही सफलता का पहला सूत्र है। इसका आत्मा पर तो अच्छा प्रभाव पड़ता ही है, बाह्य समाज में भी शासन की प्रभावना होती है।
२. व्यवहार कुशलता और शालीनता : किसी भी सिंघाड़े (साधु-समूह) में आपस में गहरा सामंजस्य होना चाहिए। व्यवहार में सदाचार, मधुर पारस्परिकता और शालीनता बनी रहे। छोटों के मन में बड़ों के प्रति अगाध विनय हो और बड़ों का छोटों के प्रति वात्सल्य भाव होना चाहिए।
३. परिश्रम शीलता और क्षेत्र संभाल : चातुर्मास प्रारंभ होने से पूर्व के शेष काल में साधु-साध्वियों को छोटे क्षेत्रों, उपनगरों और देहातों में विचरकर धर्म की अलख जगानी चाहिए। अवसर देखकर श्रावकों के घरों का स्पर्श (संभाल) करना चाहिए ताकि चातुर्मास की गतिविधियों की सही प्रेरणा जन-जन तक पहुँच सके।
मंगल प्रवचन के संपन्न होने पर पूज्य प्रवर आचार्यश्री ने उपस्थित चारित्रात्माओं द्वारा प्रस्तुत की गई तात्विक शंकाओं और जिज्ञासाओं का अत्यंत सरल शब्दों में समाधान किया।