होटल और विदेश यात्रा में भी भोजन की शुद्धता के प्रति सजग रहें जैन श्रावक, नॉनवेज-मदिरा से बनाएं दूरी : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 02 जून, 2026

होटल और विदेश यात्रा में भी भोजन की शुद्धता के प्रति सजग रहें जैन श्रावक, नॉनवेज-मदिरा से बनाएं दूरी : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने सुधर्मा सभा में 'विगय सेवन में हो विवेक' विषय पर उत्तराध्ययन सूत्र के माध्यम से पावन संबोध प्रदान किया। आचार्यश्री ने आहार संयम, रस परित्याग और ऊनोदरी को साधना व उत्तम स्वास्थ्य दोनों के लिए अनिवार्य बताते हुए विगय (दूध-दही) के अति-सेवन के प्रति सचेत किया।
तपस्या और निर्जरा का कार्य-कारण संबंध : आचार्य प्रवर ने जैन दर्शन के कर्म-सिद्धांत को स्पष्ट करते हुए मुख्य बिंदु रेखांकित किए।
१. तप से कर्म-निर्जरा : साधना के क्षेत्र में तपस्या का सर्वोच्च स्थान है, क्योंकि तप के द्वारा ही कर्मों की निर्जरा संभव है। दार्शनिक दृष्टि से तपस्या कारण है और निर्जरा उसका कार्य है। इस कार्य-कारण संबंध में अभेद की स्थापना होने से तपस्या के बारह भेद ही निर्जरा के भी बारह भेद बन जाते हैं।
२. अनाहार से जुड़े चार आयाम : साधु जीवन में अनशन, ऊनोदरी, भिक्षाचरी और रस परित्याग (विगय वर्जन)—ये चारों आयाम अनाहार और आहार संयम से सीधे जुड़े हुए हैं, जिनका यथासंभव निरंतर प्रयोग होते रहना चाहिए।
भोजन का विवेक और विगय वर्जन का नियम : शांतिदूत ने खान-पान की आसक्ति पर कड़ा प्रहार करते हुए आचरण के व्यावहारिक सूत्र दिए:
१. असंयम की असली पहचान : भोजन करने के पश्चात यदि मनुष्य का ध्यान बार-बार अपने पेट या भारीपन की ओर जाता है, तो यह इस बात का सीधा प्रमाण है कि खाने में असंयम हो गया है। इसके विपरीत, यदि रात्रि में थोड़ी भूख महसूस हो और पेट हल्का रहे, तो यह उत्तम आहार संयम का द्योतक है।
२. दूध-दही का अति-सेवन दोष : शास्त्र के अनुसार दूध और दही 'विगय' हैं। जो साधु इनका बार-बार सेवन करता है और तपस्या में रुचि नहीं रखता, वह 'विगय लोलुप' होने के कारण पाप श्रमण कहलाता है। भले ही इनसे स्वास्थ्य न बिगड़े, पर ये साधना में अवरोध अवश्य पैदा करते हैं। तेरापंथ संघ में इनका पूर्ण निषेध नहीं है, पर इनके सेवन में कड़ा विवेक व मात्रा का नियंत्रण जरूरी है।
श्रावकों को कड़ा निर्देश:होटल व विदेश यात्रा में सजगता : पूज्य प्रवर ने गृहस्थ समाज के लिए खान-पान की शुद्धता की तीन वैश्विक विचारधाराओं पर प्रकाश डाला।
१. मर्यादा का पालन : जैन श्रावकों को तामसी भोजन, नॉनवेज और मदिरा से पूरी तरह दूरी बनाए रखनी चाहिए। वर्तमान युग में यदि कभी व्यापार या यात्रा वश होटल अथवा विदेश जाना पड़े, तो अपने आहार की शुद्धता को लेकर आँखों में पूरी जागरूकता रखनी चाहिए।
२. पशु उत्पादों से संयम : संसार में शुद्ध शाकाहार के बाद दूसरी बड़ी विचारधारा पशु-आधारित उत्पादों (दूध-दही) के त्याग की भी है, जो और अधिक ऊंचे संयम की बात है। अंडा-मांस का त्याग तो बुनियादी नियम है। हर श्रावक को भोजन की मात्रा और उसकी शुद्धता का विवेक रखना ही चाहिए।
आचार्यश्री के कीर्तिमानों का ऐतिहासिक उल्लेख : मंगल प्रवचन के संपन्न होने पर सरदारशहर निवासी मुनि जम्बू कुमार जी ने वर्तमान आचार्य श्री महाश्रमण जी के पावन युग में संघ और समाज के धरातल पर स्थापित हुए अनेक ऐतिहासिक कीर्तिमानों, पदयात्राओं और रचनात्मक शासन-प्रभावना के स्वर्णिम प्रसंगों का विशेष रूप से उल्लेख करते हुए अपनी गौरवमयी भावाभिव्यक्ति प्रस्तुत की।