रात 12 बजे के बाद खाना-पीना छोड़ें गृहस्थ, रात्रि भोजन त्याग की ओर बढ़ाएं कदम : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 03 जून, 2026

रात 12 बजे के बाद खाना-पीना छोड़ें गृहस्थ, रात्रि भोजन त्याग की ओर बढ़ाएं कदम : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के उज्ज्वल नक्षत्र, अहिंसा के अग्रदूत, युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी ने सुधर्मा सभा में 'रात्रि भोजन परिहार' विषय पर आगम के आलोक में पावन प्रतिबोध प्रदान किया। आचार्यश्री ने साधु जीवन के छठे महाव्रत रूपी नियम की महत्ता बताते हुए जेठ मास की भीषण गर्मी व लू के बीच चारित्रात्माओं द्वारा की जाने वाली कठिन तितिक्षा (सहनशीलता) को रेखांकित किया।
सूर्यास्त से सूर्योदय–पानी की बूंद का भी त्याग : आचार्य प्रवर ने संयम और रात्रि निवृत्ति के कड़े नियमों को समझाते हुए मुख्य बिंदु रेखांकित किए।
१. साधुत्व का सुंदर आयाम : जैन आगम में पांच महाव्रतों के बाद छठे व्रत के रूप में सर्व रात्रि भोजन विरमण व्रत का विधान है। जहां गृहस्थ समाज में देर रात तक खाने-पीने का चलन है, वहीं चारित्रात्माएं सूर्यास्त से सूर्योदय तक अन्न तो दूर, भयंकर गर्मी में पानी की एक बूंद भी ग्रहण नहीं करतीं। दीक्षा के दिन से आजीवन चलने वाला यह नियम संयम का बहुत बड़ा उपक्रम है।
२. जेठ की दुपहरी में महान तपस्या : मई-जून की इस भीषण गर्मी में भी साधु खुले आसमान के नीचे नहीं, बल्कि आच्छादित स्थान में ही शयन करते हैं, जिससे कई बार अनिद्रा की स्थिति बनती है। चौविहार उपवास की स्थिति में दो रात और एक दिन बिना पानी के काटना और फिर व्याख्यान देना अत्यंत कठिन साधना है। जेठ के महीने में विहार करते समय संतों की पछेवड़ी (वस्त्र) पसीने से इतनी तर हो जाती है कि उसे निचोड़ना पड़ता है। यह पंचाग्नि तप से कम नहीं है।
दिन के भोजन में संयम और अध्यसन का निषेध : शांतिदूत ने चौबीस घंटे की चर्या में आहार के विवेक पर विशेष प्रकाश डाला।
१. बार-बार खाने का वर्जन : आगम के अनुसार साधु को दिन के समय भी भोजन में पूर्ण नियंत्रण रखना चाहिए। पूज्य आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी ने दिन में बार-बार भोजन करने को 'अध्यसन' (असंयम) कहा है। मध्याह्न के गोचरी-पानी के बाद और शाम के प्रतिक्रमण से पहले, पानी के अलावा कुछ भी ग्रहण नहीं करना चाहिए।
२. सूर्यास्त से पूर्व कार्य संपन्न : साधु को प्रयास करना चाहिए कि सूर्यास्त की कोर होने (सूरज डूबने) से पहले ही आहार-पानी का कार्य सुसंपन्न हो जाए। रात्रि का समय केवल ध्यान, स्वाध्याय, जप और आत्म-चित्तन के लिए सुरक्षित है। रात में साधु के पास दवाइयाँ रखना भी वर्जित है।
गृहस्थों को पाथेय: धीरे-धीरे अपनाएं मर्यादा : पूज्य प्रवर ने श्रावक समाज को भी अपनी जीवन शैली में सुधार करने की व्यावहारिक प्रेरणा दी।
१. त्याग का क्रमिक संकल्प : गृहस्थों को भी अपने आत्म-कल्याण के लिए जितना संभव हो, रात्रि भोजन त्याग का प्रयास करना चाहिए। यदि पूर्ण त्याग संभव न हो, तो कम से कम रात १० बजे के बाद कुछ भी न खाने का नियम लें।
२. न्यूनतम मर्यादा : यदि यह भी मुमकिन न हो, तो कम से कम रात्रि १२ बजे के पश्चात दवाई और पानी के सिवाय अन्य सभी तामसी व गरिष्ठ चीजों का त्याग अवश्य कर देना चाहिए। आहार-पानी के प्रति यह जागरूकता गृहस्थों के स्वास्थ्य और आध्यात्मिक विकास दोनों के लिए हितकर है।
मंगल प्रवचन के संपन्न होने पर सरदारशहर निवासी मुनि जम्बू कुमार जी और मुनि कमल कुमार जी ने भी सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ के सम्मुख अपनी ओजस्वी व सारगर्भित भावाभिव्यक्ति प्रस्तुत की।