गुरुवाणी/ केन्द्र
मकान, जमीन या सोना-चांदी स्वयं नहीं कराते कर्मों का बंधन, भीतर की मूर्च्छा ही है असली परिग्रह : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अखंड परिव्राजक, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण जी ने सुधर्मा सभा में 'मूर्च्छा परिग्रह है' विषय पर आगम के आलोक में गंभीर दार्शनिक अमृत देशना प्रदान की। इसके साथ ही प्रथम ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी के पावन अवसर पर मर्यादा पत्र (हाजरी) का सामूहिक वाचन हुआ तथा दिवंगत मुनि श्री आत्मानंद जी की स्मृति सभा आयोजित हुई।
पदार्थ नहीं, आसक्ति का भाव ही असली परिग्रह : आचार्य प्रवर ने अपरिग्रह महाव्रत की सूक्ष्मताओं को समझाते हुए मुख्य बिंदु रेखांकित किए।
१. पुद्गल नहीं कराता कर्म बंध : दुनिया में घर, मकान, संपत्ति, सोना-चांदी, आभूषण और नकद राशि आदि बाह्य परिग्रह हैं। ये जड़ पदार्थ स्वयं कभी कर्मों का बंधन नहीं करा सकते क्योंकि ये पुद्गल हैं। कर्म का असली बंधन तब होता है जब इन पदार्थों के साथ आत्मा में मूर्च्छा (आसक्ति) का भाव जुड़ जाता है।
२. अनासक्ति की चेतना : तीनों लोक में साधु के मालिकाना हक में कोई मकान या जमीन न होना बहुत ऊंची बात है। साधु वस्त्र और पात्र का उपयोग तो करता है, पर उसका भी कड़ा सीमाकरण होता है। साधक को कांता-कंचन के भ्रमर में न फंसकर पूरी तरह अनासक्त रहना चाहिए, क्योंकि आसक्ति ही महाव्रत में बाधा है।
हाजरी का नियम : न्यारे और सेवा केंद्रों में भी हो वाचन मर्यादा पत्र की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए शांतिदूत ने निर्देश दिया।
१. सामूहिक मर्यादा का वाचन : हाजरी का क्रम केवल मुख्य गुरुकुलवास तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि न्यारा (अगल-अलग स्थानों) में रहने वाले साधु-साध्वियों में भी यह नियम अनिवार्य रूप से चलना चाहिए।
२. अपरिहार्य नियम : विहार के समय यदि श्रावकों की उपस्थिति न भी हो, तब भी समय मिलते ही सभी चारित्रात्माओं को एक स्थान पर एकत्रित होकर हाजरी का वाचन कर लेना चाहिए। जिन सेवा केंद्रों में व्याख्यान आदि नहीं होते, वहाँ भी इस मर्यादा क्रम को संपन्न किया जाए। पाथेय के पश्चात सभी चारित्रात्माओं ने खड़े होकर लेख पत्र उच्चारित किए। मुनि आत्मानंद जी को भावभीनी श्रद्धांजलि: हाजरी के पश्चात शुक्रवार को कालधर्म को प्राप्त हुए मुनि आत्मानंद जी की स्मृति सभा का गरिमापूर्ण उपक्रम हुआ:
१. अचानक बिगड़ा स्वास्थ्य : पूज्य प्रवर ने परिचय देते हुए बताया कि वर्ष २०१३ में बीदासर के वृहद् दीक्षा समारोह में दीक्षित मुनि आत्मानंद जी अत्यंत स्वावलंबी और शांत चेतना के साधक थे। २८ मई २०२६ की रात्रि ११:४५ बजे भिक्षु विहार में उन्होंने अंतिम सांस ली।
२. चतुर्विध संघ ने किया ध्यान : आचार्यश्री ने दिवंगत मुनि की आत्मा के प्रति आध्यात्मिक मंगल कामना करते हुए चतुर्विध धर्म संघ सहित चार लोगस्स का सामूहिक ध्यान कराया। स्मृति सभा में मुख्य मुनि श्री महावीर कुमार जी, साध्वी प्रमुखा श्री विश्रुत विभा जी, मुनि कमल कुमार जी, मुनि श्रेयांश कुमार जी और मुनि श्री के संसार पक्षीय पुत्र विनोद डागा ने अपनी गहरी भावाभिव्यक्ति व श्रद्धांजलि अर्पित की।
सघन साधना शिविर का भव्य समापन : जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा के तत्वाधान में योगक्षेम वर्ष के अंतर्गत आयोजित नौ दिवसीय सघन साधना शिविर का मंचीय प्रस्तुतियों के साथ समापन हुआ। आचार्यप्रवर ने शिविर को बच्चों की 'सुंदर फुलवारी' बताते हुए मुख्य मुनि और साध्वी वर्या की कुशल व्यवस्थाओं को सराहा। समापन समारोह में मधु देरासरिया, बालिका ख्वाहिश पुगलिया, महासभा की ओर से डूंगरमल सालेचा और शिविरार्थी विपिन ने अपने अनुभव साझा किए तथा शिविरार्थी बालकों व बालिकाओं ने सुमधुर गीतों की सुंदर प्रस्तुतियां दीं।