गुरुवाणी/ केन्द्र
भीतर के भाव भले ही पवित्र हों, पर दुनिया केवल बाह्य भाषा और व्यवहार की कटुता देखती है : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, तीर्थंकर के प्रतिनिधि, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण जी ने सुधर्मा सभा में 'कैसे बैठें' विषय उत्तरज्झयणाणि आगम के माध्यम से पावन प्रतिबोध प्रदान किया। आचार्यश्री ने सुश्रमण और पाप श्रमण के भेदों को स्पष्ट करते हुए काया, वचन और उठने-बैठने की चर्या में अहिंसा व पूर्ण सजगता बरतने के व्यावहारिक सूत्र दिए।
अहिंसा का सूक्ष्म विज्ञान: प्रतिलेखन और प्रमार्जन : आचार्य प्रवर ने साधु चर्या के सूक्ष्म नियमों को समझाते हुए मुख्य बिंदु रेखांकित किए।
१. बिना प्रमार्जन बैठना दोष : बिछौना, कम्बल, आसन आदि पर बिना पूंजे बैठ जाना प्रमाद की निशानी है। आगम के अनुसार, बिना प्रमार्जन किए बैठने वाला साधु 'पाप श्रमण' की कोटि में आता है। हर साधक को देखकर और पूंजकर ही आसन ग्रहण करना चाहिए।
२. करवट बदलने में भी सजगता : जीव हिंसा से संपूर्ण बचाव के लिए ही साधु जीवन में रजोहरण और प्रमार्जनी का विधान है। सामान्यतया साधु को गृहस्थ के घर बैठना नहीं चाहिए। यदि विश्राम के समय लेटना हो और करवट भी बदलनी पड़े, तो पहले प्रमार्जनी से भूमि को अच्छी तरह पूंज कर ही करवट बदलनी चाहिए।
३. ईर्या समिति का पालन : मार्ग पर चलते समय साधु को शरीर प्रमाण भूमि (चार हाथ आगे) को देखते हुए चलना चाहिए। चलते समय आपस में वार्तालाप करने से बचना चाहिए। यदि चलते समय कोई टोके और साधु तुरंत उत्तर दे, तो यह भी चर्या की कमी है।
भाषा की शुद्धि और एषणा समिति के नियम : शांतिदूत ने कषाय मंदता के साथ-साथ व्यवहारिक गोचरी और भाषा की मर्यादा पर विशेष प्रकाश डाला।
१. भाषा और व्यवहार का महत्व : साधु की भाषा हमेशा यथार्थ से ओत-प्रोत और कटुता से रहित होनी चाहिए। कई बार भीतर का भाव ठीक होता है, लेकिन बाहर देखने वाला व्यक्ति केवल बाह्य व्यवहार और भाषा को ही देख पाता है। इसलिए वचन और काया पर यथायोग्य ध्यान देना आवश्यक है।
२. निर्दोष गोचरी और ऊनोदरी : श्रावक के घर गोचरी (भिक्षा) के समय लोलुपतावश कोई इशारा नहीं करना चाहिए। जो कुछ भी सहज रूप से मिल जाए, उसे सहर्ष स्वीकार करना चाहिए। सामुदायिक गोचरी करना और जीवन में ऊनोदरी (भूख से कम खाना) का प्रयोग करना श्रेष्ठ साधना है। यदि गोचरी में अनजाने में कोई दोष लग जाए, तो उसकी तुरंत गुरु के समक्ष आलोयणा ले लेनी चाहिए।
जिज्ञासा समाधान का सत्र : मंगल देशना के संपन्न होने पर पूज्य प्रवर आचार्यश्री ने उपस्थित चारित्रात्माओं की गंभीर तात्विक जिज्ञासाओं का आगम के आलोक में समाधान किया। इसके पश्चात, लाडनूं चातुर्मास स्थल पर चल रहे सघन साधना शिविर के देश-विदेश से आए शिविरार्थियों को भी अपने आराध्य के सम्मुख शंकाएं रखने का पावन अवसर मिला, जिनका गुरुदेव ने अत्यंत सरल शब्दों में निवारण कर सबको कृतार्थ किया।