गुरुवाणी/ केन्द्र
संस्कार देने वाले गुरु का उपकार भूलना साधुत्व नहीं, नारियल की तरह प्रतिफल देना ही सज्जनता :आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अखंड परिव्राजक, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने सुधर्मा सभा में 'पूज्य प्रवर के साथ कैसा व्यवहार' विषय पर उत्तरज्झयणाणि सूत्र के माध्यम से ऐतिहासिक अमृत देशना प्रदान की। आचार्यश्री ने जैन शासन में आचार्य और उपाध्याय पद की गरिमा को रेखांकित करते हुए तेरापंथ धर्मसंघ की अनूठी व सुदृढ़ शासन व्यवस्था पर विशेष प्रकाश डाला।
तेरापंथ का अद्वितीय इतिहास और सातों पदों का विलीनीकरण: आचार्य प्रवर ने संघ की प्रशासनिक व्यवस्था और गुरु भिक्षु के सिद्धांतों को समझाते हुए मुख्य बिंदु रेखांकित किए:
१. आचार्य में विलीन उपाध्याय पद : जैन शासन में आचार्य और उपाध्याय अत्यंत महत्वपूर्ण चारित्रात्माएं हैं। तेरापंथ धर्मसंघ में अलग से कोई उपाध्याय पद मनोनीत नहीं होता, बल्कि उपाध्याय का संपूर्ण दायित्व आचार्य में ही समाहित है।
२. आचार्य भिक्षु की अटूट वाणी : परम पूज्य आदि पुरुष आचार्य श्री भिक्षु ने फरमाया था कि संघ के सातों पदों का दायित्व मैं स्वयं संभालता हूँ। उनकी वह दिव्य वाणी आज तक फलित हो रही है और तेरापंथ के इतिहास में आज भी सातों पद आचार्य में ही सन्निहित हैं।
३. अंतिम जिम्मेदारी आचार्य की : हमारे संघ की व्यवस्था में आचार्य को असीम अधिकार और व्यवस्थागत जिम्मेदारी दी गई है। यद्यपि इतिहास में जयाचार्य ने व्यवस्थागत जिम्मेदारी युवाचार्य मधवा को सौंपकर स्वयं को थोड़ा हल्का किया था, तथापि पद पर रहते हुए अंतिम और मुख्य जिम्मेदारी हमेशा आचार्य की ही रहती है।
उपकारी की अवहेलना और नारियल का दृष्टांत : शांतिदूत ने शिष्यों को संस्कार देने वाले गुरु के प्रति कृतज्ञ रहने का व्यावहारिक पाठ पढ़ाया।
१.अपवित्र है गुरु निंदा करने वाला : जो आचार्य और उपाध्याय अपने शिष्यों को ज्ञान, विनय और संस्कार देकर उपकार करते हैं, उनकी पीठ पीछे बुराई या अवज्ञा करने वाला साधु 'पाप श्रमण' कहलाता है। उपकारी की अवहेलना करने वाला मनुष्य अपवित्र होता है।
२. नारियल का जीवंत उदाहरण : जिस प्रकार नारियल के पेड़ को शुरुआत में जड़ से पानी का सिंचन मिलता है, तो वह बाद में फल के रूप में मीठा पानी प्रतिफल देता है; ठीक वैसे ही सच्चे साधु और सज्जन पुरुष किसी के किए उपकार को कभी नहीं भूलते।
३. विनय और सेवा का भाव : गुरु और माता-पिता की सेवा करना परम कर्तव्य है। इसके साथ ही, यदि अपेक्षित हो तो बिना किसी सांसारिक संबंध के भी दूसरों की सेवा के लिए तत्पर रहना चाहिए। साधु-साध्वियों को सदा सद्गुण संपन्न होना चाहिए।
अंग्रेजी पुस्तक का लोकार्पण एवं जिज्ञासा समाधान : मंगल प्रवचन के विशेष प्रसंग में आज आचार्यश्री की पावन सन्निधि में 'अनुयोगद्वारम्' आगम की अंग्रेजी में अनूदित पुस्तक का गरिमापूर्ण लोकार्पण हुआ। इस अवसर पर डॉ. अनुपम जैन ने अपनी सारगर्भित अभिव्यक्ति दी, जिन्हें आचार्य प्रवर ने मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। आचार्यश्री ने डॉ. जैन द्वारा लिखित 'जैन गणित' पुस्तक के संदर्भ में भी समाज को मंगल प्रेरणा दी। कार्यक्रम के अंत में सघन साधना शिविर के शिविरार्थियों ने आराध्य के समक्ष अपनी जिज्ञासाएं रखीं, जिनका गुरुदेव ने सरल समाधान कर उन्हें कृतार्थ किया।