धर्म है उत्कृष्ट मंगल

स्वाध्याय

-आचार्यश्री महाश्रमण

धर्म है उत्कृष्ट मंगल

ऐन्टागोनिज्म (विरोध या प्रतिरोध)–
एक वनस्पति अपने आसपास दूसरी वनस्पतियों को पनपने नहीं देती। जैसे जहां अंग्रेजी बबूल होता है वहां दूसरे पौधे विकसित नहीं हो सकते। जिस समाज में यह वृत्ति होती है कि एक व्यक्ति समाज पर छाना चाहता है और दूसरे के विकास में विरोध-अवरोध पैदा करता है, वह समाज विकास की उच्च मंजिल तय नहीं कर सकता। संगठन को स्वस्थ बनाए रखने के लिए इस अन्योन्य क्रिया का परिहार अपेक्षित है।
पेरासाइट (परजीवी)–
पेरासाइट (परजीवी) की अन्योन्य क्रिया-एक वनस्पति दूसरी वनस्पति का शोषण करती है। जैसे अमर बेल। जिस वनस्पति को अमर बेल छूती है तो पहले उसके विकास को रोकती है, फिर उसे निर्बल बनाकर नष्ट भी कर सकती है। जिस समाज में अमर बेल पेदा हो जाती है वह समाज विकास के स्थान पर हास को प्राप्त होता है।
कम्पीटीशन (प्रतिस्पर्धा)–
एक वनस्पति दूसरी वनस्पति के साथ कम्पीटीशन करती है। शक्तिशाली विकसित हो जाती है, कमजोर को विकास का अवसर नहीं मिलता। संगठन के विकास के लिए यह अपेक्षित है कि समर्थ सदस्य अपने कमजोर सदस्यों को भी विकास के अवसर दें।
जैन आगमों में निगोद (वनस्पति काय के अत्यन्त सूक्ष्म जीव) का वर्णन मिलता है। निगोद के जीव उत्कृष्टतम साहचर्य का जीवन जीते हैं। अनन्त जीव एक साथ आहार लेते हैं, एक साथ श्वसन-क्रिया करते हैं और एक साथ मर जाते हैं।
वह संगठन दीर्घजीवी बन सकता है जिसके सदस्य साहचर्य का जीवन जीते हैं। एक के लिए अनेक तैयार रहते हैं। एक का सुख सबका सुख और एक का दुःख सबका दुःख होता है। पारस्परिक संवेदनशीलता सबको आश्वासन देती है। जहां हर सदस्य को सेवा और सहयोग का आश्वासन प्राप्त होता है वह समाज सुखी और विकासशील होता है।
इस प्रकार वनस्पति की अन्योन्य क्रिया का यथायोग्य स्वीकरण और परिहरण संगठन को गुणवत्ता प्रदान कर सकता है।