श्रमण महावीर

स्वाध्याय

-आचार्यश्री महाप्रज्ञ

श्रमण महावीर

स्वर्णकार मुनि से उत्तर चाहता था। मुनि उत्तर दे नहीं रहे थे। उनका मौन स्वर्णकार की आकांक्षा पर चोट करने लगा। उसने आहत स्वर में कहा- 'श्रमण ! वे स्वर्णयव मेरे नहीं हैं। वे सम्राट् श्रेणिक के हैं। मैं उनके अन्तःपुर के आभूषण तैयार कर रहा हूं। यदि वे स्वर्णयव नहीं मिलेंगे तो मेरी क्या दशा होगी, क्या आप नहीं जानते ?' आप श्रमण हैं। आपने कितना वैभव छोड़ा है! आप मेरे सम्राट् के दामाद रहे हैं। अब आप मेरे आराध्य भगवान महावीर के संघ में दीक्षित हैं। आप अपने त्याग को देखें, सम्राट् की ओर देखें, भगवान की ओर देखें और मेरी ओर देखें। मन से लोभ को निवारें, मेरी वस्तु मुझे लौटा दें। मनुष्य से भूल हो सकती है। आप साधक हैं। अभी सिद्ध नहीं हो। आप से भी भूल हो सकती है। अभी और कोई नहीं जानता। आप जानते हैं या मैं जानता हूं। तीसरा कोई नहीं जानता। आप मेरी बात पर ध्यान दें। मेरी वस्तु मुझे लौटा दें। भूल के लिए प्रायश्चित्त करें।'
स्वर्णकार द्वारा इतना कहने पर भी मुनि का मौन भंग नहीं हुआ। स्वर्णकार ने सोचा, श्रमण का मन ललचा गया है। ये दण्ड के बिना नहीं मानेंगे। उसने रास्ता बन्द कर दिया। वह तत्काल गीला चर्मपट्ट लाया। मुनि का सिर उससे कसकर बांध दिया। वे भूमि पर लुढ़क गए। सूर्य के ताप से चर्मपट्ट और साथ-साथ मुनि का सिर सूखने लगा।
मुनि ने सोचा– इसमें स्वर्णकार का क्या दोष है? वह बेचारा भय से आतंकित है। मैं भी मौन-भंग कर क्या करता? मेरे मौन-भंग का अर्थ होता-क्रौंच-युगल की हत्या। यह चक्रव्यूह किसी की बलि लिए बिना भग्न होने वाला नहीं है। दूसरों के प्राणों की बलि देने का मुझे क्या अधिकार है? मैं अपने प्राणों की बलि दे सकता हूं।
वे अपने प्राणों की बलि देने को प्रस्तुत हो गए। उनका चित्त ध्यान के प्रकोष्ठ में पहुंच गया। उनका मन सरिता में नौका की भांति तैरने लगा। कष्ट शरीर को होता है। उसकी अनुभूति मन को होती है। दोनों घुले-मिले रहते हैं, तब कष्ट का संवेदन क्षीण हो जाता है। यह है सहिष्णुता - समता के विवेक से पल्लवित, पुष्पित और फलित।
द्वन्द्व का होना जागतिक नियम है। इसे कोई बदल नहीं सकता। द्वन्द्व की अनुभूति को बदला जा सकता है। यह परिवर्तन द्वन्द्वातीत चेतना की अनुभूति होने पर ही होता है। द्वन्द्व की अनुभूति का मूल राग और द्वेष का द्वन्द्व है। इस द्वन्द्व का अन्त होने पर द्वन्द्वातीत चेतना जागृत होती है। समता आदि-बिन्दु द्वन्द्वातीत चेतना की जागृति का आदि-बिन्दु है। समता का चरम-बिन्दु द्वन्द्वातीत चेतना की पूर्ण जागृति है। इस अवस्था में समता और वीतरागता एक हो जाती है। साधन साध्य में विलीन हो जाता है। वस्तु-जगत् में द्वैत रहता है। किन्तु चेतना के तल पर द्वन्द्व के प्रतिबिम्ब समाप्त हो जाते हैं। विषमता-विहीन समता अपने स्वरूप को खो देता है। न विषमता रहती है और न समता, कोरी चेतना शेष रह जाती है।
मुक्त मानस : मुक्तद्वार
सामने की दीवार पर घड़ी है। उसमें नौ बजे हैं। क्या सब घड़ियों में नौ ही बजे हैं? यह सम्भव नहीं है। कोई दो मिनट आगे है तो कोई दो मिनट पीछे है। काल एक गति से चलता है। उसका प्रवाह न रुकता है और न त्वरित होता है। वह सदा और सर्वत्र अपनी गति से चलता है।
घड़ी काल नहीं है। वह काल की गति का सूचक-यंत्र है। यंत्र कभी शीघ्र चलने लगता है और कभी मंद। यह गति-भेद इस सत्य की सूचना देता है कि काल और घड़ी एक नहीं हैं।
धर्म और धर्म-संस्थान भी एक नहीं हैं। धर्म सत्य है। सत्य देश और काल से अबाधित होता है। देश बदल जाने पर धर्म नहीं बदलता। जो धर्म भारत के लिए है, वही जापान के लिए और जो जापान के लिए है, वही भारत के लिए है। भारत और जापान के धर्म दो नहीं हो सकते। जो धर्म अतीत में था, वही आज है और आने वाले कल में भी वही होगा। काल बदल जाने पर धर्म नहीं बदलता।
प्यास लगती है और हम पानी पीते हैं। प्यास लगने पर हम पानी ही पीते हैं, रोटी नहीं खाते। यह क्यों? इसका हेतु निश्चित नियम है। पानी पीने से प्यास बुझ जाती है, हर देश में और हर काल में। यह नियम देश और काल से बाधित नहीं है इसलिए यह सत्य है।