संबोधि

स्वाध्याय

-आचार्यश्री महाप्रज्ञ

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मंत्र-ग्रहण के लिए यह भी आवश्यक है कि वह किसी मंत्र विशेषज्ञ गुरु के द्वारा प्रदत्त होना चाहिए। मंत्र के चुनाव में अनेक शत्रु, मित्र आदि तथ्यों का दर्शन किया जाता है, अन्यथा वह सफल नहीं होता। कुछ मंत्र जैसे-'सोहं, ॐ,' नमस्कार मंत्र आदि अपवाद होते हैं। वे सभी के लिए ग्राह्य हैं। किन्तु उनकी सम्यक् विधि और प्रयोग का प्रशिक्षण अपेक्षित है। सम्यक् प्रशिक्षण के अभाव में भी मंत्र का कार्य असफल देखा जाता है।
मंत्र और योग–
मंत्र और योग परस्पर संबंधित है। योग चित्तवृत्ति का निरोध तथा एकाग्रता है। एकाग्रता के बिना मंत्र का उच्चारण व्यर्थ चला जाता है। कबीर ने कहा है–
माला तो कर में फिरे, जीभ फिरे मुख मांय।
मनुवा तो दस दिशि फिरे, यह तो सुमिरण नांय॥
मंत्र जप के साथ मानसिक एकाग्रता, श्रद्धा, दृढनिष्ठा, पवित्रता, शुभ-भावना, उच्चारण का सम्यक् ज्ञान आदि तथ्य नितांत विशेय है।
फ्रांस की महिला वैज्ञानिक 'फिनलांग' ने शब्द-विज्ञान पर अ‌द्भुत परीक्षण किया और वह इस परिणाम पर पहुंची कि शब्दों के साथ भावों का गहन संबंध है। हृदय शब्द का प्रतिबिंब है। 'फिनलांग' ने अपने लिए एक वीणा स्वयं तैयार की और नीचे की ओर तारों के साथ एक चाक का टुकड़ा बांध दिया। चाक को एक बोर्ड पर लगा दिया गया। वीणा को बजाने से चाक हिलने लगा और बोर्ड पर कुछ अस्पष्ट रेखाएं खिंच गई। उसने अनुभव किया कि जिस तरह गाना गाया जाता है और साज बजता है, उसी तरह की आकृतियां बोर्ड पर बन जाती हैं। एक बार उसने रोमन कैथोलिक मत के अनुयायी को अपना धार्मिक गीत गाने का निमंत्रण दिया। उसके गाने से बोर्ड पर एक स्त्री की गोद में बालक का चित्र खिंच गया। स्त्री मरियम और बालक ईसा था। गीत में प्रभु ईसा की स्तुति की गई थी। उसे इस पर भी संतोष नहीं हुआ। उसने वहां पढ़ रहे एक भारतीय विद्यार्थी को बुलाया और संस्कृत मंत्रों के उच्चारण की प्रार्थना की। विद्यार्थी ने कालभैरवाष्टक के स्तोत्र का गान किया। इससे एक भयंकर मूर्ति और कुत्ते की रेखाएं अंकित हो गई। स्तोत्र में व्यक्त भावना के अनुरूप ही आकृति बन गई। इससे वह इस निर्णय पर पहुंची कि शब्दों का भावों से गहन संबंध होता है और उन पर शब्दों का विशेष प्रभाव पड़ता है। यही कारण है कि मंत्रों द्वारा हृदय और मस्तिष्क विशेष रूप से प्रभावित होते हैं और उनके जप और पाठ से मानसिक और आध्यात्मिक शक्तियों का उद्भव होता है।
ध्वनि-विज्ञान के विशारद वैज्ञानिकों ने ध्वनि के आधार पर अनेक आश्चर्यजनक प्रयोग किए हैं। ध्वनि के माध्यम से अनेक व्यक्तियों को असाध्य रोग से मुक्त किया है, सफल ऑपरेशन किया है, हीरे को काटा है। यौगिक ग्रंथियों का जागरण और प्राणों का जागरण भी मंत्र द्वारा किया जा सकता है। इस ध्वनि का मूल स्रोत है अनाहत, जहां से शब्द का जन्म होता है। अजपाजप, अनाहत की बात योग के विद्यार्थियों से अपरिचित नहीं है। आहत शब्द-मंत्र के द्वारा अनाहत को पकड़ना लक्ष्य है। ध्वनि से यह जो कुछ वैशिष्ट्य सम्पादित होता है, अगर अनाहत पकड़ में आ जाये तो उसकी कल्पना क्या की जाए? प्राणाचार्य पुस्तक में लिखा है- 'सारे शब्द और अक्षर जो ध्वनिमात्र प्रतीत होते हैं, वे एकनाद के मूर्त रूप है। वह नाद जिसे वक्ता के अतिरिक्त कोई नहीं सुन सकता। स्थान और प्रयत्न के बिना भी वह प्रत्यक्ष है। स्थान और प्रयत्न से उच्चारित ध्वनि आहत नाद है। आहत नाद का स्रोत तो अनाहत नाद ही है, जिसे मूल ध्वनि (Voice of the Silence) या आत्मनाद (Spiritual Sound) कह सकते हैं। धारणा, ध्यान, समाधि का साधन अनाहत नाद है, जिससे सारे रोग दूर हो जाते हैं।
जप और मंत्र– जप और मंत्र शब्दावलंबी होने से दोनों में भिन्नता नहीं है। एक के साथ दूसरे का योग सहजतया जुड़ जाता है। जप के अनेक प्रकार हैं-
वाचिक– जो दूसरों को सुनाई दे।
उपांशु– दूसरों को सुनाई न दे।
मानसिक– जिसमें होठ और जीभ का प्रयोग न कर जो केवल मन से किया जाए।