मुनि प्रसन्नकुमार जी तत्त्वरसिक,  तपस्वी और कष्ट सहिष्णु सन्त थे

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मुनि मदन कुमार

मुनि प्रसन्नकुमार जी तत्त्वरसिक, तपस्वी और कष्ट सहिष्णु सन्त थे

तेरापंथ धर्मसंघ बड़े भाग्य से मिलता है। इस धर्म शासन को नन्दन वन की उपमा दी गयी है। इसके आद्य प्रणेता परमपूज्य आचार्य श्री भिक्षु स्वामी महायशस्वी महापुरुष थे। उनमें साधना, तितिक्षा और वैराग्य की पराकाष्ठा थी। उनकी उत्तरवर्ती आचार्य-परंपरा बहुत गौरवशाली और प्राणवान है। इस धर्मसंघ में दीक्षित होना सौभाग्य है और समाधि मरण करना महासौभाग्य है। इसलिये ही शायद कहा जाता होगा कि साधु जीये तो लाख का और मरे तो सवा लाख का। यद्यपि साधु को मरण की कामना नहीं करना है, पण्डित मरण (सकाम मरण) की कामना की जा सकती है।
मुनि प्रसन्न कुमारजी तत्त्वरसिक, तपस्वी और कष्ट सहिष्णु सन्त थे। उनकी दीक्षा तेरापंथ की राजधानी लाडनूं में परमपूज्य युगप्रधान आचार्य श्री तुलसी के कर-कमलों से विक्रम संवत् २०३४ आषाढ़ शुक्ला तृतीया को हुई थी। उन्हें पहला चतुर्मास गुरुकुलवास में करने का सौभाग्य मिला और फिर वे बहिर्विहारी बन गये। उनकी दीक्षा से एक लाभ यह हुआ कि वे बंधु-त्रिपुटी बन गये, क्योंकि उनकी दीक्षा से पूर्व उनके बंधुवर मुनि संजय कुमारजी और मुनि प्रकाश कुमारजी धर्मसंघ में दीक्षित हो गये थे।
मुनि प्रसन्न कुमारजी का यह सौभाग्य था कि उन्हें श्रद्धेय मंत्री मुनि सुमेरमलजी 'लाडनूं' के सान्निध्य में विकास करने का सुअवसर मिला और सुदूर प्रदेशों में विकास करने की यात्रा करने का सुनहरा अवसर मिला। यात्रा से उपकार होता है और अनुभव की वृद्धि होती है। देशाटन का साधु जीवन में बहुत मूल्य है।
सन् 1985 में श्रद्धेय मुनि महेन्द्र कुमारजी स्वामी का चतुर्मास दिल्ली में था। मैं (मुनि मदन कुमार) और मुनि अजित कुमारजी स्वामी साथ में थे। सन् 1986 में दिल्ली में हमारा पुनः चतुर्मास होने से परमाराध्य गुरुदेव श्री तुलसी ने कल्प की दृष्टि से श्रद्धेय मुनि संगीत कुमारजी स्वामी को दिल्ली भिजवाया। मुनि प्रसन्न कुमारजी उनके साथ में थे। इस तरह पांच सन्तों का चतुर्मास सदर बाजार में हुआ। साथ में रहने का अच्छा मौका मिला। शान्त सहवास और सामुदायिक जीवन बहुत मूल्यवान होता है।
सन् 1989 के योगक्षेम वर्ष लाडनूं में श्रद्धेय मुनि सोहन लालजी (श्रीडूंगरगढ़), मुनि महेन्द्र कुमारजी स्वामी, मुनि मुदित कुमारजी (परम पूज्य युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमणजी) आदि दस सन्तगण एक वर्ग में रहे। बड़ा आनन्द मंगल रहा। सहवास का आनन्द आया। मुनि प्रसन्न कुमारजी भी इस वर्ग में थे।
महामना आचार्य श्री तुलसी ने सन् 1994 के मर्यादा महोत्सव के अवसर पर मुनि प्रसन्न कुमारजी को अग्रगण्य बनाया और उनका पहला चतुर्मास दौलतगढ़ में हुआ। उन्हें मुनि हनुमानमलजी स्वामी के साथ में सेवा देने का लगभग 31 वर्ष तक अग्रगण्य के रूप में सौभाग्य मिला। इस वर्ष वे भीलवाड़ा में चतुर्मास करने के लिये पधारे पर अचानक काल-धर्म को प्राप्त हो गये। नवदीक्षित मुनिश्री प्रीत कुमारजी को उनकी सेवा करने का अच्छा मौका मिला। लाडनूं में दीक्षित मुनि प्रसन्न कुमारजी की लाडनूं में ही परमपावन आचार्य श्री महाश्रमणजी के सान्निध्य में स्मृति-सभा हुई।