मुनिवर आत्मानन्द जी, मानव जीवन रो असली लियो आनन्द जी

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मुनि कमल कुमार

मुनिवर आत्मानन्द जी, मानव जीवन रो असली लियो आनन्द जी

मुनिवर आत्मानन्द जी, मानव जीवन रो असली लियो आनन्द जी।
(1) लघुवय में ही पिता गुजरग्या, माता थाने पाल्या।
थे भी समझदार बणकर के सब ने खूब संभाल्या ॥ मुनिवर...
(2) संत सत्यां री सेवा करके, पाया शुभ संस्कार।
तुलसी गुरुवर दीक्षा खातर, प्रकट कर्या उद्गार ॥ मुनिवर...
(3) अमृत सर में धर्म ध्यान री, गंगा खूब बहाई।
समय-समय चौमासा देकर, गुरुवर महर कराई ॥ मुनिवर...
(4) श्रद्धानिष्ठ अलंकरण सुण, खुशियां अपरम्पार।
श्रम रो अंकन करके गुरुवर, करदी जय-जय कार ॥ मुनिवर...
(5) तुलसी महाप्रज्ञ री थां पर महर रही अनपार।
महाश्रमण दीक्षा देकर के कर्यो घणो उपकार ॥ मुनिवर...
(6) अस्सी-वय में दीक्षा लेकर खूब दिखायो जोश।
तन-मन स्यूं सेवा में लाग्या, सगला ने संतोष ॥ मुनिवर...
(7) योग-क्षेम वर्ष रो अवसर, किस्मत जागी म्हारी।
सेवा रो अवसर में पायो, गुरु अर्जी स्वीकारी ॥ मुनिवर...
(8) समाधिस्थ बणकर के रहिज्यो, आ म्हारी अरदास।
तप जप मौन साधना द्वारा पाओ परम प्रकाश ॥ मुनिवर...
(9) सदा स्वावलंबी रहणो रा, देख्यो जबरो कोल।
देख देख कर थारी वृत्त्यां, कियां करां म्हे मौल॥ मुनिवर...
(10) थोड़ी सी गड़बड़ होता ही, कर्यो शीघ्र संकेत।
म्हारो तो अब समय आग्यो हो थिया जबर सचेत॥ मुनिवर...
(11) महाश्रमण गुरु महर करा कर दर्श दिया तत्काल।
संथारे री अर्जी सुनकर चकित हुया गणपाल
सबस्यूं खमत खामना करके जीत्यो जग जंजाल।। मुनिवर..
(12) त्रय घंटा रा त्याग कराया, सरध्या बेकर जोड़ ।
चटके थे तो काम बणायो, मन इकतारी जोड़ ॥ मुनिवर..
(13) अंत समय में छोटा मोटा, संत होग्या भेला ।
पल भर में ही श्रावकां रा जबरा चाल्या रेला ॥ मुनिवर..
(14) भिक्षु शासन है जयवन्तो, जन-जन री आवाज ।
देख देख कर थारी दृढ़ता, चार तीर्थ ने नाज ॥ मुनिवर..
(15) विनय नम्रता सहन शीलता, देखी अपरम्पार ।
आगे स्यूं आगे थे बढ़ज्यो, प्राप्त करो शिव द्वार ॥ मुनिवर..
(16) महाश्रमण गुरुवर दीक्षा दे, थाने किया निहाल ।
म्हैं भी म्हारा कोड़ पुरावॉ, गाकर मुनिगण ढाल ॥ मुनिवर..
(17) योग क्षेम वर्ष रा अवसर, चार तीर्थ रा ठाठ ।
सब ने जबारो सीन दिखायो, कर के हृदय विराट ॥ मुनिवर..
 (तर्ज : म्हारा बाबा भैरूनाथ)