युगधर्म के प्रेरणास्रोत : आचार्य श्री तुलसी

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मुनि मदन कुमार

युगधर्म के प्रेरणास्रोत : आचार्य श्री तुलसी

अणुव्रत युगधर्म है, मानव मात्र को संयम की ओर आकृष्ट करने की इसमें शक्ति है। अणुव्रत का उद्घोष है - संयम ही जीवन है। इसमें जीवन का दर्शन समाहित है। संयम के बिना शान्ति और शान्ति के बिना सुख की कल्पना ही दुरूह है। अणुव्रत प्रवर्त्तक आचार्य श्री तुलसी ने अणुव्रत आन्दोलन के माध्यम से इस सच्चाई को उजागर करने का सार्थक श्रम किया। उन्होंने खूब देशाटन किया, खूब साहित्य लिखा, खूब जन संपर्क किया और खूब प्रवचन कर जनता जनार्दन को आलोकमय बनाया। वे इस धर्मपरायण देश के पहले धर्मगुरु थे जिन्होंने उपासना को गौण कर आचार-शुद्धि का बिगुल बजाया।
अणुव्रत आन्दोलन के माध्यम से आचार्य श्री तुलसी मानव धर्म के महान व्याख्याकार बने। उन्होंने अपने परिचय में कहा - 'मैं सबसे पहले मानव हूँ, उसके बाद धार्मिक हूँ और तदनन्तर धर्माचार्य हूँ।' वे जनता के जीवन-परिष्कार के लिये कहते थे - 'मुझे वोट नहीं चाहिये, मुझे नोट नहीं चाहिये और मुझे प्लॉट भी नहीं चाहिये किन्तु मुझे तुम्हारे जीवन की खोट चाहिये।' जीवन की खोट मांगने वाले वे विलक्षण सन्त थे। अपने ओजस्वी विचारों से उन्होंने लाखों लोगों के हृदय पर शासन किया। उनकी वाणी और व्यक्तित्व में चमत्कार था
राष्ट्रऋषि आचार्य श्री तुलसी 22 वर्ष की वय में तेरापंथ धर्मसंघ के आचार्य बन गये, यह एक आश्चर्य है किन्तु इससे भी बड़ा आश्चर्य यह है कि 58 वर्षों तक तेरापंथ पर शासन करने के पश्चात् आचार्य पद का विसर्जन कर दिया। विरोध को विनोद समझने वाले शलाकापुरुष थे। वे सत्य, शिव और सौन्दर्य के संगम पुरुष थे।
युगद्रष्टा आचार्य श्री तुलसी विक्रम संवत् 2054 आषाढ़ कृष्णा तृतीया को इस संसार से अदृश्य हो गये, किंतु फिर भी वे लाखों लोगों के हृदय में बसे हुये हैं। शुचिता के वे संगम पुरुष थे। 'ज्यों की त्यों धर दीनी रे 'चदरिया' के वे सार्थक प्रतीक बने। उनका जीवन द्वितीया के चान्द की तरह सदा प्रवर्द्धमान रहा! उनके महाप्रयाण के पश्चात् दिल्ली में आयोजित स्मृति सभा में अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था – 'आचार्य श्री तुलसी अग्रणी सन्त, चिन्तक और कर्मयोगी थे। उन्होंने आचार्य पद छोड़ दिया, मानो वे महाप्रस्थान की तैयारी कर रहे थे।' राष्ट्रीय समाचार पत्र दैनिक हिन्दुस्तान के मुख्य संवाददाता रमाकान्त गोस्वामी ने एक बार मुझसे 'मुनि मदन कुमार' मिलन-प्रसंग पर कहा था कि राष्ट्रऋषि आचार्य श्री तुलसी जैन धर्म के शंकराचार्य थे। वे 'भारत रत्न' के सच्चे अधिकारी हैं!