गुरुवाणी/ केन्द्र
बीमारी और मौत तो निश्चित हैं, पर मन में निर्मलता और समता बनाए रखना ही है सर्वोच्च तपस्या : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अधिशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता, शांतिदूत आचार्य श्री महाश्रमण जी ने सुधर्मा सभा में 'संसार में दुःख है' विषय पर उत्तराध्ययन सूत्र के माध्यम से गहन तात्विक अमृत देशना प्रदान की। आचार्यश्री ने नव-तत्वों के गणित से दुःख और दुःख-मुक्ति के अंतर्संबंधों को खोलते हुए संसार की नश्वरता के बीच समता भाव की साधना का कड़ा पाठ पढ़ाया।
दुःख भी बन सकता है आत्म-विकास का माध्यम : आचार्य प्रवर ने कष्टों के सकारात्मक और व्यावहारिक पहलू को समझाते हुए मुख्य बिंदु रेखांकित किए।
१. विपत्ति में जागता है संकल्प: यह संसार स्वयं दुःख रूप है और यहाँ पग-पग पर कष्ट हैं; परंतु दुःख की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसी विकट स्थिति में इंसान के भीतर धर्म की सच्ची भावना, प्रभु का स्मरण, इष्ट की स्मृति और उत्तम संकल्प जागृत होते हैं। इसलिए दुःख कई बार मनुष्य के आंतरिक विकास में सहायक बनकर उसे भविष्य के परम सुख (मोक्ष) की ओर गतिमान कर देता है।
२. कार्य-कारण वाद और ९ तत्व : जैन दर्शन के ९ तत्वों के अनुसार दुःख एक 'कार्य' है। नव-तत्वों में पाप तत्व साक्षात दुःख है और जब इस पाप का उदय होता है, तभी जीवन में कष्ट आते हैं। वहीं, आश्रव तत्व इस दुःख का मूल 'कारण' है।
आगम के चार महादुःख: जरा से पहले जागने की चेतावनी : शांतिदूत ने संसार के चक्रव्यूह और मानव जीवन की चार कड़वी सच्चाइयों पर प्रकाश डाला।
१. जन्म और २. बुढ़ापा : आगम में चार प्रकार के मुख्य दुःख बताए गए हैं, जिनमें पहला जन्म लेना ही महाकष्ट है। दूसरा दुःख बुढ़ापा (जरा) है। पूज्य प्रवर ने कड़ा बोध देते हुए चेताया कि जब तक बुढ़ापा शरीर को पूरी तरह जर्जर और पीड़ित करने न लगे, उससे पहले ही हर समझदार इंसान को समय रहते धर्म का संचय कर लेना चाहिए।
३. बीमारी और ४. मृत्यु : तीसरा दुःख बीमारी है, जो कभी भी किसी को भी घेर सकती है—चाहे वह बच्चा हो, जवान हो या बूढ़ा। बीमारी के समय रोने-बिलखने के बजाय समता भाव रखना चाहिए। चौथा दुःख मृत्यु है। मरण के भय से कांपने के बजाय आत्मा में निर्मलता बनाए रखना ही जैन शासन का मूल आचार है।
संवर-निर्जरा ही हैं पूर्ण दुःख-मुक्ति के मार्ग : पूज्य प्रवर ने दुःखों के इस अंतहीन चक्र से हमेशा के लिए छूटने का अचूक आध्यात्मिक वैज्ञानिक उपाय बताया।
१. मोक्ष ही है अंतिम दुःख-मुक्ति : जैसे पाप और आश्रव दुःख के कारण हैं, वैसे ही नव-तत्वों का अंतिम नवां तत्व यानी मोक्ष स्वयं में संपूर्ण दुःख-मुक्ति (परम सुख) का कार्य है। इस मोक्ष रूपी कार्य को सिद्ध करने वाले दो ही सबसे बड़े कारण हैं—संवर (कर्मों के आने को रोकना) और निर्जरा (पुराने कर्मों को तपाकर नष्ट करना)।
२. संन्यास से कटेगा बंधन : इस दुनिया के तमाम झंझटों और कष्टों से स्थाई रूप से छुटकारा दिलाने वाला एकमात्र तत्व शुद्ध धर्म है। संन्यास और साधुत्व की उत्कृष्ट साधना ही दुःख-मुक्ति का एकमात्र अमोघ उपाय है। हमें जो ज्ञान, दर्शन और चारित्र रूपी अध्यात्म का राजमार्ग मिला है, उस पर दृढ़ता से आगे बढ़ते रहने से ही मोक्ष की प्राप्ति संभव है।
मंगल प्रवचन के संपन्न होने पर पूज्य प्रवर आचार्यश्री ने सुधर्मा सभा में उपस्थित चारित्रात्माओं द्वारा संघ मर्यादा, तत्व-ज्ञान और चर्या के संदर्भ में प्रस्तुत की गई गहन जिज्ञासाओं को अपनी अमृत वाणी से समाहित किया।