धन, पद और प्रतिष्ठा का त्याग करने से ही मिलेगी सच्ची शांति, इच्छाओं का परिसीमन करें गृहस्थ : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 07 जून, 2026

धन, पद और प्रतिष्ठा का त्याग करने से ही मिलेगी सच्ची शांति, इच्छाओं का परिसीमन करें गृहस्थ : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अखंड परिव्राजक, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने सुधर्मा सभा में 'लोक में शांतिकर्ता शांति' विषय पर उत्तराध्ययन सूत्र के माध्यम से गहरा तात्विक प्रतिबोध प्रदान किया। आचार्यश्री ने जैन भूगोल (कॉस्मोलॉजी) के रहस्यों को खोलते हुए भौतिक वैभव के त्याग और आत्म-कल्याण के शाश्वत मार्ग पर चलने की अमर प्रेरणा दी।
जैन भूगोल: १५ कर्म भूमियों का विज्ञान : आचार्य प्रवर ने ब्रह्मांड की रचना और तीर्थंकरों की अवस्थिति को विस्तार से समझाया।
१. १५ कर्म भूमियों की व्यवस्था: जैन भूगोल के अनुसार इस मनुष्य लोक में कुल पन्द्रह कर्म भूमियां हैं। जंबू द्वीप में एक भरत क्षेत्र, एक ऐरावत क्षेत्र और एक महाविदेह क्षेत्र! इसी प्रकार घातकी खंड द्वीप में दो-दो और अर्द्ध पुष्करवर द्वीप में भी दो-दो क्षेत्र मिलाकर कुल १५ कर्म भूमियां बनती हैं।
२.भरत और महाविदेह में अंतर: हमारे भरत क्षेत्र में तीर्थंकरों की चौबीसी की काल चक्र के अनुसार व्यवस्था होती है, जिससे यहाँ हमेशा तीर्थंकरों का सान्निध्य नहीं रहता। इसके विपरीत, महाविदेह क्षेत्र में चौबीसी की व्यवस्था नहीं है; वहाँ कम से कम २० तीर्थंकर हमेशा साक्षात रूप में विद्यमान रहते हैं।
तीर्थंकर और आचार्य का भेद: ५४ उत्तम पुरुष : शांतिदूत ने धार्मिक जगत के अधिकृत प्रवक्ताओं और महापुरुषों के भेदों को स्पष्ट किया।
१. साधना से मिलता है तीर्थंकरत्व : तीर्थंकर और आचार्य में एक बहुत बड़ा सैद्धांतिक अंतर है। आचार्य किसी पूर्व आचार्य के मनोनीत उत्तराधिकारी के रूप में पद ग्रहण करते हैं, जबकि तीर्थंकर किसी के मनोनीत उत्तराधिकारी नहीं होते। वे अपने पूर्व जन्मों के उत्कृष्ट कृतित्व, उग्र साधना और महापुण्य के बल पर स्वयं तीर्थंकरत्व को प्राप्त करते हैं। वे सहज रूप से सर्वज्ञ व सर्वद्रष्टा होते हैं और उनकी वाणी ही स्वयं आगम बन जाती है।
२. अध्यात्म और भौतिकता के दो सर्वोच्च शिखर : जैन आगमों में कुल ५४ उत्तम पुरुषों (२४ तीर्थंकर, १२ चक्रवर्ती, ९ वासुदेव और ९ प्रतिवासुदेव) का वर्णन है। चक्रवर्ती जहाँ भौतिक (सांसारिक) जगत का सर्वोच्च पद है, वहीं तीर्थंकर आध्यात्मिक जगत का अंतिम और सर्वोच्च शिखर हैं।
३. काल चक्र का प्रभाव : वर्तमान में भरत क्षेत्र में अवसर्पिणी काल (घटता हुआ समय) चल रहा है। इसके पहले आरे से छठे आरे तक मनुष्यों की आयु और शरीर की अवगाहना (ऊंचाई) क्रमशः घटती जाती है, जबकि उत्सर्पिणी काल में यह पुनः बढ़ती है।
भगवान शांतिनाथ का महान आदर्श: इच्छाओं का परिसीमन : पूज्य प्रवर ने चक्रवर्ती सम्राट से तीर्थंकर बने भगवान शांतिनाथ के जीवन से गृहस्थों को सीख दी।
१. एक समय के बाद जरूरी है त्याग : भगवान शांतिनाथ इस अवसर्पिणी काल के ऐसे महान उत्तम पुरुष हुए, जो एक ही जन्म में चक्रवर्ती भी बने और तीर्थंकर भी। इतने असीम भौतिक वैभव और साम्राज्य के शिखर पर होने के बावजूद उन्होंने उसका पल भर में त्याग कर दिया और आत्म-कल्याण के लिए संयम पथ पर बढ़ गए।
२. त्याग से ही संभव है शांति: इस महान चरित्र से मानव समाज को यह प्रेरणा लेनी चाहिए कि जीवन में व्यक्ति चाहे कितने ही ऊंचे पद पर क्यों न पहुँच जाए, एक समय के पश्चात उसे अपनी आत्मा के कल्याण की ओर मुड़ना ही चाहिए। मनुष्य को अपनी अनियंत्रित इच्छाओं, आकांक्षाओं, धन, पद और प्रतिष्ठा के कदाग्रह को छोड़ना होगा। गृहस्थ समाज भी अपनी मर्यादा और इच्छाओं का जितना परिसीमन (सीमाकरण) करेगा, जीवन में उतनी ही सुख-शांति का अवतरण होगा।
प्रवचन के अंत में आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं को चेताया कि साधु जीवन का मूल आधार ही त्याग और संयम है, अतः पाँच महाव्रतों, पाँच समितियों और तीन गुप्तियों के प्रति पल-पल सजग रहना ही सुश्रमण का परम कर्तव्य है।