गुरुवाणी/ केन्द्र
शारीरिक व्यायाम नहीं बल्कि आंतरिक अध्यात्म साधना है असली योग : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमण जी योगक्षेम वर्ष के अंतर्गत अपनी अध्यात्म गंगा से जन-जन के मानस को सिंचित कर रहे हैं। प्रातःकालीन सुधर्मा सभा में 'भोग का कटुक विपाक' विषय पर उत्तराध्ययन सूत्र के माध्यम से पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए शांतिदूत ने भीतरी जगत के रहस्यों, आचार की सर्वोच्चता और भोग व योग के बुनियादी अंतर को स्पष्ट किया।
भीतर का जगत : कार्मण शरीर और जातिस्मृति ज्ञान : आचार्य प्रवर ने मनुष्य की आंतरिक चेतना और कर्मों के अंतर्संबंधों को रेखांकित किया।
१. आँखों से ओझल भीतरी संसार : हमारा आंतरिक जगत आत्मा और कर्मों का एक मिला-जुला संसार है। हम बाहरी दुनिया को तो थोड़ा-बहुत देख पाते हैं, लेकिन कार्मण शरीर और आत्मा से युक्त भीतरी जगत को इन चर्म चक्षुओं (आँखों) से देख पाना साधारणतया संभव नहीं है। गहन साधना के बल पर ही भीतर का अवबोध संभव है।
२. जन्मों तक चलते हैं संबंध : पूज्य प्रवर ने फरमाया कि पूर्वजन्मों का स्मरण कराने वाला 'जातिस्मृति ज्ञान' तीन कारणों (स्वयं की चेतना, तीर्थंकर की देशना या उनके पास से सुनकर) से प्रकट होता है। इस ज्ञान से जहाँ आत्मा में वैराग्य की वृद्धि होती है, वहीं यह सत्य भी सामने आता है कि इस संसार में हमारी आपसी मित्रता और द्वेष (वैर) के संबंध किसी एक जन्म के नहीं, बल्कि कई जन्मों तक लगातार पीछे-पीछे चलते रहते हैं।
भोग और योग का अंतर्विरोध: विषफल के समान सुख : शांतिदूत ने आगामी अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के संदर्भ में योग की वास्तविक परिभाषा दी।
१. शारीरिक कसरत नहीं है असली योग : वर्तमान युग में योग का अर्थ केवल शारीरिक व्यायाम या आसनों तक सीमित मान लिया गया है। यह विचार इतना व्यापक हो चुका है कि आगामी २१ जून को पूरी दुनिया में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाएगा; परंतु जैन दर्शन के अनुसार योग का वास्तविक और मूल अर्थ केवल शारीरिक कसरत नहीं, बल्कि आत्मा को परमात्मा से जोड़ने वाली 'अध्यात्म साधना' है।
२. विषफल का कड़वा परिणाम : संसार के भौतिक भोग बिल्कुल 'विषफल' के समान हैं। विषफल खाते समय शुरुआत में तो बहुत मीठा और स्वादिष्ट लगता है, परंतु उसका अंतिम परिणाम जीवन का अंत (कड़वा) कर देता है। ठीक इसी प्रकार, सांसारिक वैभव और इंद्रियों के भोग एक बार तो बहुत लुभावने लगते हैं, पर आत्मा की दृष्टि से उनका अंतिम विपाक केवल दुःख और दुर्गति ही होता है।
आचार और विनय ही साधना का केंद्र : पूज्य प्रवर ने चारित्रात्माओं को साधुत्व के मूल तत्वों के प्रति सजग रहने का कड़ा संदेश दिया।
१. भाषण कला केवल परिधि : प्रवचन कला, वक्तृत्व कौशल या मंच संचालन जैसी योग्यताएं साधना के मार्ग में केवल बाहरी 'परिधि' (दिखावा या विस्तार) मात्र हैं। साधु जीवन का असली 'केंद्र' (आत्मा) तो केवल आचारशीलता और विनयशीलता ही है। यदि केंद्र मजबूत नहीं है, तो परिधि का कोई मूल्य नहीं है।
२. बचपन का त्याग व संयम : जो आत्माएं सांसारिक भोगों की निस्सारता को समझकर बचपन या छोटी उम्र में ही त्यागी बनकर साधुत्व ग्रहण कर लेती हैं, और जीवन भर महाव्रतों, पांच समितियों व तीन गुप्तियों का पालन करती हैं, उनका पुरुषार्थ व संयम साधना असीम है। हर साधक को अपने प्राणों से भी बढ़कर अपनी संयम साधना की रक्षा करनी चाहिए। मंगल प्रवचन के संपन्न होने पर पूज्य प्रवर आचार्यश्री ने उपस्थित साधु-साध्वियों द्वारा संघ व्यवस्था और आचार चर्या को लेकर प्रस्तुत की गई तात्विक जिज्ञासाओं का आगम के आलोक में सहज समाधान प्रदान किया।