गुरुवाणी/ केन्द्र
बहुत बड़े पांडित्य के बिना भी कषाय मंदता और आचार की शुद्धि से निश्चित है आत्मा का कल्याण : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अधिशास्ता, अहिंसा के अग्रदूत, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी की पावन सन्निधि में लाडनूं की धरा पर स्थित जैन विश्व भारती में योगक्षेम वर्ष के आध्यात्मिक कार्यक्रम गतिमान हैं। सुधर्मा सभा में 'सुव्रत रहो' विषय पर उत्तराध्ययन सूत्र के माध्यम से पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए आचार्यश्री ने अवचेतन मन की शुद्धि, कषाय मंदता और कर्म-निर्जरा के गहन रहस्यों को प्रकट किया।
स्वप्न में भी विस्मृत न हो महाव्रतों की मर्यादा : आचार्य प्रवर ने साधुत्व की अंतःचेतना को जागृत करते हुए मुख्य बिंदु रेखांकित किए।
१. अमृत की तरह पूजित सुव्रत मुनि : जो साधक पाप श्रमण कहलाने वाले सभी दोषों का सदा के लिए वर्जन (त्याग) कर देता है, वह मुनियों में 'सुव्रत' होता है। व्रत, संयम और संन्यास रूपी इस अमृत का पान करने वाला साधु इस लोक में पूजित होकर अमर बन जाता है और उसकी आत्मा मोक्षगामी होती है।
२. अवचेतन मन की पुष्टता : पूज्य प्रवर ने फरमाया कि 'मैं साधु हूँ' यह भावना साधक के भीतर और अवचेतन मन में इतनी गहरी पुष्ट हो जानी चाहिए कि यदि रात्रि में स्वप्न भी आए, तो उसमें भी अपनी साधुता और सुव्रत होने का ही आभास हो। पांच महाव्रतों, पांच समितियों और तीन गुप्तियों की अखंड साधना ही सुव्रती का वास्तविक लक्षण है।
मोहनीय कर्म का नाश और आचार की महत्ता : शांतिदूत ने दार्शनिक दृष्टिकोण से कर्मों के राजा और आचार की शक्ति को समझाया।
१. सेनापति के गिरते ही सेना ढेर : साधना के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा मोहनीय कर्म है। यह कर्म कर्म-दल का 'सेनापति' है। यदि साधना के बल पर यह सेनापति नष्ट हो जाए, तो ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय और अन्तराय कर्म रूपी बाकी की सेना अपने आप नष्ट हो जाती है।
२. पांडित्य के बिना भी कल्याण : दुनिया में ज्ञान, क्रिया और अक्रिया के कई सिद्धांत हैं, पर अनेकांत दृष्टि कहती है कि यदि कोई साधु शास्त्रों का बहुत बड़ा ज्ञाता (पांडित्य) नहीं भी है, लेकिन वह अपने महाव्रतों का आचार पूरी शुद्धि से पालता है और कषाय मंद रखता है, तो वह भी १२वें गुणस्थान तक पहुँचकर अपनी आत्मा का कल्याण कर सकता है। ज्ञान एक ऐसी तलवार और अग्नि है जो अज्ञान के अंधकार को काट देती है, और यह समुद्र से नहीं बल्कि आत्मा के भीतर से प्रकट होने वाला अमृत है।
७५ वर्ष से अधिक के वृद्ध संतों को पाथेय : आचार्यप्रवर ने संघ के वरिष्ठ संतों और अपनी क्षमतानुसार निर्जरा करने के व्यावहारिक सूत्र दिए।
सुप्रणिधान और स्वावलंबन: संघ में जो चारित्रात्माएं ७५ वर्ष से अधिक आयु की हो चुकी हैं, वे अपने आपको सुप्रणिधान साधना (गहन आत्म-लीनता) में नियोजित करें। इसके साथ ही, जहाँ तक संभव हो, हर साधु को अंतिम समय तक स्वावलंबी जीवन जीने का प्रयास करना चाहिए। अपनी रुचि के अनुसार संत स्वाध्याय, तप, सेवा या नवकार व लोगस्स का जप कर कर्म-निर्जरा कर सकते हैं।
मुमुक्षु बहिन प्रेक्षाध्यान शिविर की शुरुआत : जैन विश्व भारती में आध्यात्मिक चेतना के एक और नए अध्याय का सूत्रपात हुआ। प्रारंभ हो रहे मुमुक्षु बहिन प्रेक्षाध्यान शिविर के संदर्भ में पूज्य प्रवर आचार्य श्री महाश्रमण जी ने शिविरार्थी मुमुक्षु बहिनों को मांगलिक पाठ सुनाकर इस विशेष साधना सत्र की उपसंपदा (दीक्षा-पूर्व मानसिक तैयारी का संकल्प) प्रदान की और उनके उज्ज्वल भविष्य की मंगल कामना की।