गुरुवाणी/ केन्द्र
मारने की क्षमता होने पर भी किसी जीव को न मारना ही है सर्वोच्च अहिंसा, कायरों का नहीं वीरों का मार्ग है धर्म : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमण जी ने सुधर्मा सभा में 'अभयदाता बनो' विषय पर उत्तराध्ययन सूत्र (उत्तरज्झयणाणि आगम) के आलोक में पावन प्रतिबोध प्रदान किया। आचार्यश्री ने फरमाया कि संसार में अन्न, वस्त्र और स्वर्ण के अनेक दानवीर हो सकते हैं, परंतु छह काय के जीवों को अभयदान देने वाले साधु से बड़ा दानी ब्रह्मांड में कोई नहीं है।
अहिंसा शौर्ययुक्त हो, कायरता की निशानी नहीं : आचार्य प्रवर ने अहिंसा के वास्तविक क्षत्रिय धर्म और शौर्य को समझाते हुए मुख्य बिंदु रेखांकित किए।
१.मारने की क्षमता पर नियंत्रण: अहिंसा कोई कायरता या कमजोरी का नाम नहीं है। अहिंसा तो पूर्ण शौर्य और वीर्य (शक्ति) से युक्त होनी चाहिए। यदि किसी व्यक्ति में दूसरे को मारने या दंड देने की पूरी क्षमता हो, और फिर भी वह संयम रखकर किसी को न मारे, तो वही दुनिया में सबसे बड़ी अहिंसा की बात है।
२.भय का विनय निरर्थक : एक सच्चे अहिंसक को न तो स्वयं किसी से डरना चाहिए और न ही संसार में किसी दूसरे प्राणी को डराना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति केवल भय के मारे किसी के सामने झुकता है या विनय करता है, तो उस विनय का कोई आध्यात्मिक मूल्य नहीं है; सच्चा विनय तो केवल श्रद्धा के भीतर से प्रकट होना चाहिए।
शिकार महाव्यसन, अभयदान ही सर्वश्रेष्ठ : शांतिदूत ने सात व्यसनों पर प्रहार करते हुए गृहस्थ समाज को भी मर्यादा का मार्ग दिखाया।
१. शिकार से बचें गृहस्थ : मानव जीवन को कलंकित करने वाले सात महाव्यसन (जुआ, मांसाहार, मदिरापान, चोरी, वेश्यागमन, परस्त्रीगमन और शिकार) बताए गए हैं। शिकार करना चेतना को क्रूर बनाता है। भले ही गृहस्थ पूरी तरह से अहिंसक न बन सके, परंतु उसे कम से कम निर्दोष मूक प्राणियों के शिकार रूपी इस महापाप से हर हाल में बचना चाहिए।
२.अहिंसा की संवर-निर्जरा साधना : साधु की साधना ऐसी उत्कृष्ट होती है जिसके आत्म प्रदेशों में—यानी आत्मा के चप्पे-चप्पे पर—अहिंसा का भाव अखंड रूप से पुष्ट रहता है। जीवन की अनित्यता को देखकर मनुष्य को संवर और निर्जरा रूपी अध्यात्म के मार्ग पर कदम बढ़ाना चाहिए ताकि वह एक दिन अपनी अंतिम मुक्ति रूपी मंजिल को प्राप्त कर सके।
त्रुटि पर तुरंत खमत-खामणा की परंपरा : आगम की प्रेरक कथाओं का दृष्टांत देते हुए पूज्य प्रवर ने विनय धर्म की मर्यादा पर विशेष प्रकाश डाला।
१. आशातना का तुरंत परिहार: चाहे साधु हो या गृहस्थ, जीवन में कभी भी किसी भी जीव या गुरु की आशातना (अवहेलना) नहीं करनी चाहिए। यदि अज्ञानवश या भूल से कभी किसी की आशातना हो भी जाए, तो बिना किसी अहंकार के तुरंत 'खमत-खामणा' (क्षमा याचना) कर लेनी चाहिए। यही जैन शासन की महान विनय प्रतिपत्ति की समृद्ध परंपरा है।
२. धन्य हैं समर्पित माता-पिता : पूज्य प्रवर ने शासन गौरव की अभिवृद्धि करने वाले कुलों की सराहना करते हुए फरमाया कि वे माता-पिता वास्तव में इस संसार में धन्य हैं, जो अपनी प्रिय संतानों को सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठाकर इस महान धर्म संघ और संयम के मार्ग के लिए समर्पित कर देते हैं। मंगल देशना के संपन्न होने पर सुधर्मा सभा में उपस्थित मुनि कमलकुमार जी ने चतुर्विध धर्मसंघ के सम्मुख आज के विषय के आलोक में अपनी बहुत ही सारगर्भित, ओजस्वी और भावपूर्ण अभिव्यक्ति प्रस्तुत की।