सत्ता और राजनीति केवल जनता की सेवा के लिए है, भोग-विलास या वैर-विरोध के लिए नहीं : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 06 जून, 2026

सत्ता और राजनीति केवल जनता की सेवा के लिए है, भोग-विलास या वैर-विरोध के लिए नहीं : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अखंड परिव्राजक, युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी ने शनिवार की सुधर्मा सभा में 'पर भव में कौन जाता है?' विषय पर आगम व शांत सुधारस ग्रंथ के आलोक में पावन प्रतिबोध प्रदान किया। आचार्यश्री ने अनित्य अनुप्रेक्षा के माध्यम से संसार की नश्वरता को समझाते हुए राष्ट्र के राजनेताओं और संघीय व्यवस्थापकों को शुचिता, ईमानदारी और दूरदृष्टि का कड़ा पाठ पढ़ाया।
ध्रुव को छोड़ अध्रुव के पीछे भागना ही मोह: आचार्य प्रवर ने जीवन की अनित्यता और नश्वरता को रेखांकित करते हुए मुख्य बिंदु समझाए।
१. शाश्वत और नश्वर का भेद : जैन दर्शन के अनुसार आत्मा, परमात्मा और अहिंसा रूपी धर्म ही इस ब्रह्मांड में एकमात्र 'ध्रुव' (शाश्वत) सत्य हैं। इसके विपरीत धन-संपत्ति, वैभव, शरीर और सांसारिक संबंध पूरी तरह 'अध्रुव' (नश्वर) हैं। जो मनुष्य सांसारिक पदार्थों के मोह-मूर्च्छा में फंसकर नष्ट होने वाली चीजों के पीछे भागता है, वह अपने शाश्वत ध्रुव (धर्म) को खो देता है।
२. उम्र घटाता हर ढलता सूरज : हर दिन का सूर्यास्त मानव जीवन का एक दिन अपने साथ लेकर चला जाता है। लोग जन्मदिन आने पर बड़ी खुशियाँ मनाते हैं, ढोल-नगाड़े बजाते हैं, किंतु इस परम सत्य को भूल जाते हैं कि उसी दिन उनके पूर्ण आयुष्य (उम्र) में से एक वर्ष कम हो चुका होता है। इसलिए समय रहते धर्म का संचय कर लेना ही बुद्धिमानी है।
राजनीति पर कड़ा बोध: सत्ता भोग नहीं, सेवा का साधन: शांतिदूत ने वर्तमान लोकतांत्रिक और राजनीतिक मूल्यों पर गंभीर मार्गदर्शन दिया।
१. ईमानदारी और सिद्धांतवादी हो राजनेता : राजनीति स्वयं में कोई बुरी चीज नहीं है, बल्कि यह जनता जनार्दन की सेवा करने का एक बहुत बड़ा और प्रभावी माध्यम है। राजनीति के बिना किसी भी राष्ट्र का सुचारू संचालन असंभव है। इसलिए राजनीति के शीर्ष पर बैठे व्यक्तियों को पूर्ण जानकार, सिद्धांतवादी, निष्पक्ष, ईमानदार और सेवा भावना से ओत-प्रोत होना चाहिए।
२. सत्ता में रहकर वैर-विरोध वर्जित : राजनेताओं को यह सदैव स्मरण रखना चाहिए कि सत्ता और कुर्सी केवल लोक-कल्याण के लिए मिली है, विलासिता या भोग के लिए नहीं। पद और सत्ता का दुरुपयोग कर किसी भी व्यक्ति को दुर्भावनावश संकट में नहीं डालना चाहिए और न ही अपने मन में किसी के प्रति वैर-विरोध का हिंसक भाव रखना चाहिए।
संगठन का भविष्य और उत्तराधिकारी का दायित्व : पूज्य प्रवर ने धार्मिक व सामाजिक संगठनों के सुदृढ़ भविष्य निर्माण पर विशेष प्रकाश डाला।
१. दूरदृष्टि से होता है विकास: चाहे देश को चलाने वाली राजनीति हो या धर्म संघ को चलाने वाला संगठन, नेतृत्व करने वाले राजा या आचार्य को हमेशा भविष्य पर ध्यान देना चाहिए। जो भविष्य की दूरदृष्टि रखकर योजनाएं बनाते हैं, वही श्रेष्ठ कार्य कर पाते हैं।
२.आचार्य के प्रति पूर्ण समर्पण: वर्तमान के उत्तराधिकारी को संघ के दीर्घकालिक विकास और उज्ज्वल भविष्य के लिए सदैव पैनी दृष्टि रखनी चाहिए। अपने आचार्य के पावन मार्गदर्शन और अनुशासन में रहकर पूरे समर्पण भाव से संघीय कार्यों की गतिशीलता को आगे बढ़ाते रहना ही शासन की सच्ची प्रभावना है। मंगल प्रवचन के संपन्न होने पर
पूज्य प्रवर आचार्यश्री ने उपस्थित चारित्रात्माओं द्वारा प्रस्तुत की गई तात्विक जिज्ञासाओं का आगम के आलोक में सहज समाधान किया।