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आत्मा को आत्मा से देखना ही सच्चा ध्यान
आचार्य श्री महाश्रमणजी की सुशिष्या साध्वी संयमलताजी के सानिध्य में प्रेक्षावाहिनी के अंतर्गत प्रेक्षा ध्यान कार्यशाला हुई। साध्वी श्री ने फरमाया - जैनधर्म में दान, शील, तप और भाव रूपी 4 धर्म हैं। यादृशी भावना यस्य तादृशी सिद्धिस्तस्य-जैसी भावना वैसी सिद्धि। शुद्ध भावों से ही सफलता मिलती है। साध्वी मार्दवश्री जी ने कहा - तनाव, Overthinking से मुक्ति का उपाय प्रेक्षा ध्यान है। आचार्य महाप्रज्ञजी ने 12 वर्ष साधना कर भीतर जाने का मार्ग बताया।हम ईंट-चुना के घर में रहते हैं, पर भीतर के घर में जाने का प्रयास करें। ध्यान के प्रयोग करवाए गए। युवाओं से आह्वान - रोज 15 मिनट ध्यान करें तो पढ़ाई, व्यवसाय, परिवार में संतुलन बनेगा। श्रावक-श्राविकाओं की अच्छी उपस्थिति रही। तेरापंथ सभा KGF ने साध्वी वृंद का आभार किया।