3 बातें ज्ञान की

स्वाध्याय

– आचार्यश्री महाश्रमण

3 बातें ज्ञान की

आर्हत् वाङ्मय में बत्तीस आगम हैं, जो जैन श्वेताम्बर तेरापंथ के द्वारा सम्मत हैं। बत्तीस आगमों का एक समूह है। उसमें कई वर्गीकरण हैं। पहले वर्गीकरण में ग्यारह अंग आगम हैं। दूसरे वर्गीकरण में बारह उपांग आगम हैं। तीसरे वर्गीकरण में चार मूल आगम हैं। चौथे वर्गीकरण में चार छेद आगम हैं और पांचवें वर्गीकरण में एक आवश्यक सूत्र है। बत्तीस आगमों में ग्यारह अंगों का ऊंचा स्थान है। इन ग्यारह अंगों को स्वतः प्रमाण के रूप में माना गया है। तीसरा अंग आगम है ठाणं। इसमें दस अध्याय (दस स्थान) हैं।
ठाणं के तीसरे अध्याय में कहा गया है– तिविहे जोगे पण्णत्ते, तं जहा-मणजोगे, वइजोगे, कायजोगे। 3/13
योग तीन प्रकार का होता है-
1. मनोयोग
2. वचनयोग
3. काययोग
योग शब्द का एक विशेष अर्थ है। शरीर, वाणी और मन की प्रवृत्ति योग है। शरीर की प्रवृत्ति काययोग है, वाणी की प्रवृत्ति वचनयोग है और मन की प्रवृत्ति मनयोग है। चौदहवें गुणस्थान में आदमी योग से रहित होता है। जैन वाङ्मय में साधना की चौदह सीढ़ियां हैं। चौदहवीं सीढ़ी अंतिम सीढ़ी है। उसके बाद मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। यद्यपि चौदहवीं सीढ़ी वर्तमान में यहां से प्राप्त नहीं हो सकती। यहां से तो अभी आदमी सातवीं सीढ़ी से ऊपर नहीं जा सकता। चौदह में से आधी सीढ़ियां अभी खुली हैं। अगली सात सीढ़ियां अभी बंद हैं। आठवीं सीढ़ी पर यहां कोई साधु-साध्वी नहीं चढ़ सकते। ज्यादा से ज्यादा सात सीढ़ी चढ़ सकते हैं। चौदहवीं सीढ़ी में जो साधक पहुंच जाता है, वह योग रहित यानी अयोगी बन जाता है। वहां न मन की प्रवृत्ति होती है, न वचन की प्रवृत्ति होती है, न शरीर की प्रवत्ति होती है। वहां पूर्णतया अयोग अवस्था होती है। हम तो सभी अभी योगी हैं। केवल साधु ही नहीं, श्रावक ही नहीं, सामान्य आदमी भी योगी है। एक चींटी भी योगी है। एक मकोड़ा भी योगी है। वनस्पतिकाय के जीव भी योगी हैं। यहां प्रश्न हो सकता है कि वे कौनसे योगी हैं? वे प्रवृत्ति वाले योगी हैं अर्थात् जिसके योग है, वह योगी है।
योग शब्द का एक अर्थ साधनापरक भी होता है। आचार्य हेमचंद्र ने 'अभिधान चिंतामणि' में योग शब्द का अर्थ मोक्ष का उपाय किया है। ज्ञान, दर्शन और चारित्र भी योग है। मैं जिस आगम (ठाणं) की व्याख्या कर रहा हूं, वहां यह व्याख्या नहीं है। वहां मन, वचन, काया की प्रवृत्ति को योग कहा गया है। योग दो प्रकार का होता है-शुभ योग और अशुभ योग। दूसरे शब्दों में इन्हें निरवद्य योग और सावद्य योग कहा जा सकता है। गृहस्थ सामायिक करते हैं, उसमें सावद्य योग का प्रत्याख्यान किया जाता है, किन्तु निरवद्य योग का त्याग नहीं होता। जब हम साधुत्व स्वीकार करते हैं, तब हमें जीवनभर के लिए सर्व सावद्य योग का त्याग कराया जाता है, किन्तु निरवद्य योग का नहीं। साधु बनने के बाद किसी ने उपवास आदि कर लिया तो वह निरवद्य योग का भी त्याग हो गया। सिद्धान्ततया साधु का तो खाना भी धर्म है, पीना भी धर्म है, बैठना आदि भी धर्म है यानी साधु की तो हर क्रिया धर्मयुक्त होती है। कोई साधु खाने-पीने का त्याग करता है तो वह निरवद्य योग का त्याग करता है यानी वह साधना में और ज्यादा आगे बढ़ने का संकल्प लेता है।
आगम में बताया गया है कि एक समय में एक ही योग होता है। एक समय में दो योग नहीं हो सकते। हमारी चेतना या तो चिंतन आदि में लगेगी या बोलने में लगेगी या शरीर की चेष्टा में लगेगी। यह तो थोड़ी-सी सूक्ष्म बात है। तीनों ही योग शुभ भी हो सकते हैं और अशुभ भी हो सकते हैं। मन के द्वारा आदमी हिंसा का चिंतन करे, झूठ बोलने, चोरी करने, किसी को दुःख देने का सोचे, किसी के बारे में अनिष्ट कामना करे, मन में गुस्सा करे, यह अशुभ मनोयोग हो गया। शब्दों में गुस्सा कर लिया, गालियां दीं, किसी को डांटा-फटकारा, यह अशुभ वचनयोग हो गया। किसी के थप्पड़ लगा दी, लाठी की मार दी, यह अशुभ काययोग हो गया।
मन में अर्हतों की भक्ति करना, देव, गुरु, धर्म के प्रति श्रद्धा का भाव रखना, आत्मचिंतन करना, आत्म-कल्याण के बारे में विचार करना, दूसरों के आध्यात्मिक विकास की कामना करना, यह सारा शुभ मनोयोग हो गया। वाणी से नवकार मंत्र का जप करना, भक्ति गीत गाना, प्रभु की स्तुति करना, अर्हतों की वाणी का स्वाध्याय करना, यह शुभ वचनयोग हो गया। शरीर से साधु को वंदन करना, शुद्ध दान देना, साधु के द्वारा साधु की शारीरिक सेवा करना, यह शुभ काययोग हो गया।