श्रमण महावीर

स्वाध्याय

– आचार्यश्री महाप्रज्ञ

श्रमण महावीर

मन अशांत होता है, तब हम धर्म की ओर झांकते हैं। मन की अशांति मिटाने के लिए हम धर्म की ओर ही झांकते है, धन की ओर नहीं झांकते। यह क्यों? इसका हेतु निश्चित नियम है। धर्म की अनुभूति से मन की अशांति मिट जाती है, हर देश में और हर काल में। यह नियम देश और काल से बाधित नहीं है इसलिए यह सत्य है।
सत्य एक रूप होता है। यह श्रमणों का सत्य और यह वैदिकों का सत्य-यह भेद नहीं हो सकता। वैदिक धर्म और श्रमण धर्म, जैन धर्म और बौद्ध धर्म-ये धर्म-संस्थान हैं, धर्म के तंत्र हैं, धर्म नहीं है। ये धर्म नहीं हैं, इसलिए अनेक हो सकते हैं, भिन्न और परस्पर विरोधी भी। ये सत्य को शब्द के माध्यम से पकड़ने का प्रयत्न करते हैं, जैसे एक शिशु तालाब में पड़ने वाले सूर्य के प्रतिबिम्ब को पकड़ने का प्रयत्न करता है।
एक आदमी कमरे में बैठा है। द्वार बन्द है। एक छोटी-सी खिड़की खुली है। उस पर जाली लगी हुई है। यह सच है कि आदमी खिड़की से झांककर आकाश को देख सकता है। किंतु यह भी इतना ही सच है कि वह सम्पूर्ण आकाश को नहीं देख सकता। आकाश उतना ही नहीं है जितना वह देख सकता है और यह भी सच है कि वह आकाश को सीधा नहीं देख सकता, जाली के व्यवधान से देख सकता है।
भगवान महावीर ने एक बार गौतम से कहा- 'जब धर्म का द्रष्टा नहीं होता तब धर्म अनुमान की जाली से ढंकी हुई शब्द की खिड़की से झांककर देखा जाता है। उस स्थिति में उसके अनेक मार्ग और अनेक मार्ग-दर्शक हो जाते हैं। गौतम ! तुम्हें जो मार्ग मिला है, वह द्रष्टा बनने का मार्ग है। तुम जागरूक रहो और धर्म के द्रष्टा बनो।'
भगवान महावीर धर्म के द्रष्टा थे। वे अचेतन में अचेतन धर्म को देखते थे और चेतन में चेतन धर्म को। वे यथार्थवादी थे। भय, प्रलोभन या अतिशयोक्तिपूर्ण प्रतिपादन उन्हें प्रिय नहीं था।
आचार्य हेमचन्द्र ने लिखा है- 'भगवन्! आपने यथार्थ तत्त्व का प्रतिपादन किया, इसलिए आपके व्यक्तित्व में वह कौशल प्रकट नहीं हुआ, जो घोड़े के सींग उगाने वाले नव-पंडित के व्यक्तित्व में प्रकट हुआ है।'
अनेकांत दृष्टि और यथार्थवाद-ये दोनों साथ-साथ चलते हैं। जो अनेकांत दृष्टि वाला नहीं होता, वह यथार्थवादी नहीं हो सकता और जो यथार्थवादी नहीं होता, वह अनेकांत दृष्टि वाला नहीं हो सकता। भगवान महावीर में अनेकांत दृष्टि और यथार्थवाद-दोनों पूर्ण विकसित थे। इसलिए वे सत्य को संघीय क्षितिज के पार भी देखते थे।
१. एक बार भगवान कौशाम्बी से विहार कर राजगृह आए और गुणशीलक चैत्य में ठहरे। गौतम स्वामी भिक्षा के लिए नगर में गए। उन्होंने जन-प्रवाद सुना-तुंगिका नगरी के बाहरी भाग में पुष्पवती नाम का चैत्य है। वहां भगवान पार्श्व के शिष्य आए हुए हैं। कुछ उपासक उनके पास गए और कुछ प्रश्न पूछे। जन-जन के मुंह से यह बात सुन गौतम के मन में जिज्ञासा उत्पन्न हुई। उन्होंने उपासकों से पूछा- 'बताओ, तुमने क्या प्रश्न किए और पार्वापत्यीय श्रमणों ने क्या उत्तर दिए?'
हमने उनसे पूछा– 'भन्ते! संयम का क्या फल है? तप का क्या फल है?'
पार्श्वपत्यीय श्रमणों ने उत्तर दिया– 'संयम का फल नए बन्धन का निरोध है। तप का फल पूर्व बंधन का विमोचन है।'
इस पर हमने पूछा– 'भन्ते! संयम का फल नए बंधन का निरोध और तप का फल पूर्व बंधन का विमोचन है तब फिर देवलोक में उत्पन्न होने का हेतु क्या है?'
इस प्रश्न के उत्तर में स्थविर कालियपुत्त ने कहा- 'आर्यो! जीव पूर्व तप से देवलोक में उत्पन्न होते हैं।'
स्थविर मेहिल ने कहा– 'आर्यों! जीव पूर्व संयम से देवलोक में उत्पन्न होते हैं।
स्थविर आनंदरक्षित ने कहा– 'आर्यों ! शेष कर्मों से जीव देवलोक में उत्पन्न होते हैं।'
स्थविर काश्यप ने कहा- 'आर्यों! आसक्ति क्षीण न होने के कारण जीव देवलोक में
उत्पन्न होते हैं।'
गौतम इन प्रश्नोत्तरों का विवरण प्राप्त कर भगवान् के पास पहुंचे।