स्वाध्याय
संबोधि
अजपाजप– जिसमें मन का भी प्रयोग नहीं; जो स्वतः सतत होता है, उसका अनुभव करना। महर्षि पतंजलि ने ईश्वर का वाचक 'प्रणव' 'ॐ' कहा है। 'ॐ' मूल शब्द ध्वनि है। इसी से समग्र शास्त्रों का प्रणयन हुआ है। उसका अर्थयुत चिंतन करना जप है। क्रमशः उस 'ॐ' शब्द का जप छोड़कर उसके गुंजन को सुनना और अंत में सहज जो 'ॐ' की सतत धारा प्रवाहित हो रही है उसमें अपने को विलीन कर देना, अनाहत सुनना।
जप-विधि– मंत्र शक्तिशाली होता है। किन्तु उसकी शक्ति का उद्घाटन सम्यक् आचरण के बिना संभव नहीं होता। प्रत्येक वस्तु का विधिवत् उपयोग किया जाता है, अन्यथा वह उसके लिए इष्टकर नहीं होती। मंत्रों की विधिवत् आराधना न करने से अनेक दुर्घटनाएं भी घटित हो जाती हैं और वे मंत्र सहजतया सिद्ध भी नहीं होते। इसलिए आचार्यों ने मंत्राराधना की कुछ विधियां प्रयुक्त की हैं। जप के लिए चार बातें आवश्यक हैं-
(१) जप
(२) स्मरण
(३) विचिंतन
(४) ध्यान
जप– विधिपूर्वक मंत्र का अभ्यास। इसके लिए निम्नोक्त चार तथ्य मननीय हैं-
(१) मंत्र के अक्षरों का उच्चारण एक अक्षर दूसरे अक्षर के साथ संलग्न होना चाहिए तथा बीजाक्षरों के उच्चारण में ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत मात्राओं का ध्यान रखना चाहिए।
(२) मंत्र का उच्चारण जल्दी-जल्दी नहीं होना चाहिए।
(३) एक अक्षर व दूसरे के बीच बिलंब नहीं होना चाहिए।
(४) सुषुम्ना में जप करना चाहिए।
सूरिमंत्रकल्पसन्दोह के अनुसार जप-विधि इस प्रकार है–
१. चन्द्रनाड़ी द्वारा रेचन भावना-रागरूप लाल रंग की वायु का रेचन हो रहा है।
२. सूर्यनाड़ी द्वारा रेचन भावना-द्वेषरूप काले रंग की वायु का रेचन हो रहा है।
३. राग-द्वेष से मुक्त होकर चन्द्रनाड़ी द्वारा पूरक भावना-सतोगुणरूप श्वेत वायु नाभि में सम्यक् स्थापित हो रहा है।
४. होठ बन्द।
५. दांत ऊपर-नीचे अस्पृष्ट।
६. नासाग्र पर दृष्टि।
७. अंतर्जपरूप या अनाहतनादरूप स्मरण करना।
देवभद्रसूरि ने 'कथा रत्नकोष' में मंत्र स्मरण की विधि का निर्देश इस प्रकार दिया है–
१. आंखें निस्पन्द, नासाग्र दृष्टि।
२. केवल कुंभक ।
३. इन्द्रिय-प्रत्याहार।
४. अनाहत नाद में लग्न स्मरण करना।
५. प्रत्येक अक्षर को चन्द्रकला से युक्त कर उसमें से झरते अमृत-प्रवाह का चिंतन करना।
६. उस अमृत-प्रवाह से तीनों लोकों का दुःख-दावानल शांत हो गया है।
७. मंत्राक्षरों का लाखों सूर्यों से भी अधिक तेजस्वी चिंतन।
८. मंत्र के प्रभाव से विघ्नकारक भूतादि गण दूर हो गए हैं-चिंतन करें।
मंत्र-शास्त्रों में तीन प्रकार के करण का उल्लेख है, जो जप की सफलता में सहयोगी है। दिव्यकरण उसमें महत्त्वपूर्ण है। (१) कुंभकरण (२) दिव्यकरण (३) ऊध्वरचनकरण। साधक योग व्यापार (क्रिया) और करण से युक्त न हो तो मंत्रोच्चार का कोई मूल्य नहीं। करण में रेचन आदि करणों का समावेश होता है।