सेवापरायण सन्त मुनिश्री आत्मानन्दजी

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मुनि मदन कुमार

सेवापरायण सन्त मुनिश्री आत्मानन्दजी

परमपूज्य युगप्रधान आचार्य श्री तुलसी का जन्म शताब्दी वर्ष का अप्रतिम अवसर ! ज्योतिपुंज आचार्य श्री महाश्रमणजी की अनुपम अनुकंपा से 43 दीक्षाओं का भव्य समारोह । मुनि श्री आत्मानन्दजी का भाग्योदय ! दीक्षा नया जन्म और नया प्रस्थान है। अच्छे भाग्य का निर्माण है। क्षयोपशम को प्रबल बनाने की साधना है। भिक्षु - शासन में दीक्षा होना महान अनुष्ठान है। जो शान्ति और समाधि साधु को मिलती है, वह गृहस्थ को कहां ? भगवान महावीर ने कहा - 'गृहवास क्लेश सहित है और मुनि जीवन क्लेश रहित। गृहवास बंधन है और मुनि जीवन मोक्ष। गृहवास सावद्य है और मुनि जीवन निरवद्य।'
मुनि श्री आत्मानन्दजी 80 वर्ष की अवस्था में मुनि बने, यह उनका परम सौभाग्य था। ऐसा सुअवसर किसी बड़भागी को ही मिलता है। यह परमपावन आचार्य श्री महाश्रमणजी के शासन काल का एक कीर्तिमान है। परमपूज्य आचार्य श्री तुलसी के शासन काल में मुनि श्री अमृतानन्दजी को 73 वर्ष की अवस्था में दीक्षा प्रदान की गयी थी।
भगवान महावीर का साधनाकाल लगभग साढ़े बारह वर्ष रहा और मुनि श्री आत्मानन्दजी का साधना काल भी लगभग साढ़े बारह वर्ष का रहा ।
मुनि श्री आत्मानन्दजी सेवापरायण साधु थे। वे यौगलिक की तरह सरल आत्मा थे, अल्पोपाधि और अल्पाहारी थे। उनमें श्रम और सेवा के संस्कार गहरे थे। उनका सारा जीवन सेवा-धर्म से भावित रहा। जो श्रम और सेवा करता है, उसमें चुम्बकीय आकर्षण पैदा हो जाता है, फिर उसमें यदि सरलता और विनम्रता हो तो कहना ही क्या ? उनके बारे में इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि वे एक
अच्छे श्रावक थे और जीवन के संध्या काल में अच्छे साधु बन गये। वे मुख्य रूप से बोरावड़ और छापर में प्रवासी रहे और समाधिपूर्ण अपनी आत्माराधना करते रहे। योगक्षेम वर्ष में उन्हें परमाराध्य गुरुदेवश्री की पावन सन्निधि मिल गयी, यह उनका परम सौभाग्य था। वे जीवन के दसवें दशक में छापर सेवाकेन्द्र से पाद-विहार करते हुये लाडनूं - जैन विश्व भारती में पहुंचे और योगक्षेम वर्ष में संभागी बन गये।
सन् 2014 में मुनिश्री आत्मानन्दजी श्रद्धेय मुनिश्री पृथ्वीराजजी स्वामी के साथ बोरावड़ में थे। मेरा (मुनि मदन कुमार) चतुर्मास उस वर्ष बोरावड़ में था। अच्छा योग बना। कई बार मुनिश्री आत्मानन्दजी मेरी वस्त्र-सिलाई कर लेते थे। इस तरह उनमें सेवा करने का बड़ा शौक था। वे दूर-दूर से पानी ले आते थे तथा कार्य में शक्ति का नियोजन करते थे।
मुनि श्री आत्मानन्दजी का गृहस्थ नाम श्री इन्द्रचन्दजी डागा था। उनकी सेवा-वृत्ति से उन्हें महामना युगप्रधान आचार्य श्री महाप्रज्ञजी से 'श्रद्धानिष्ठ श्रावक' का अलंकरण प्राप्त हुआ था। उनका लिपि-कौशल अच्छा था, अद्भुत था। उनके सुन्दर अक्षर आश्चर्यन्वित करते थे। गृहस्थ जीवन में वे साधु-साध्वियों के साहित्यिक कार्य में बड़े सहयोगी रहे। शासनगौरव मुनिश्री बुद्धमल्लजी स्वामी आदि अनेक सन्तों के 'धारण' का कार्य निष्ठापूर्वक किया। उनका मुनि-जीवन प्रशस्त रहा। उनकी चाल द्रुत थी, शरीर हल्का था और मोह कर्म कम था, ऐसा लगता है। मोह कृश हो जाये, इससे बड़ी उपलब्धि क्या हो सकती है? शान्त सहवास और सौहार्दमय जीवन का
मंत्र उनके पास था। मुनि श्री आत्मानन्दजी गुरु सन्निधि में 28 मई, 2026 को दिवंगत हो गये। वे परमपूज्य अष्टमाचार्य श्री कालूगणी के युग में जन्मे और परमपूज्य आचार्य श्री महाश्रमणजी के शासन काल में कार्य सिद्ध कर गये।