गुरुवाणी/ केन्द्र
कामनाएँ ही मानसिक तनाव की असली जड़ हैं, इच्छाओं पर ब्रेक लगाना ही सच्ची साधना है : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अधिशास्ता, शांतिदूत, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने जैन विश्व भारती परिसर की सुधर्मा सभा में 'समभाव से सहें वेदना' विषय पर उत्तरज्झयणाणि आगम के माध्यम से पावन पाथेय प्रदान किया। आचार्यश्री ने आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी समस्या—तनाव, चिंता और बीमारी का तात्विक विश्लेषण करते हुए आंतरिक शांति बनाए रखने का कड़ा पाठ पढ़ाया।
दुःख का मूल कारण: जहाँ कामना-वहाँ दुःख –
आचार्य प्रवर ने इंसानी मन की कमज़ोरियों और मानसिक व्यथा के अंतर्संबंधों को बेहद तीखे शब्दों में रेखांकित किया।
१. इच्छाओं से जनित तनाव : मनुष्य अपने मन में ढेरों कामनाएँ पाल लेता है, पर यह ज़रूरी नहीं कि हर इच्छा पूरी हो। कामना के टूटते ही मन में दुःख और तनाव का जन्म होता है। सीधा सिद्धांत है—'जहाँ कामना है, वहाँ दुःख निश्चित है।'
२. व्याधि, आधि और उपाधि का भेद : शरीर की बीमारियों को 'व्याधि', मन की चिंताओं व व्यथा को 'आधि' और भावात्मक असंतुलन को 'उपाधि' कहा जाता है। यदि आत्मिक साधना पुष्ट नहीं है, तो इंसान छोटी-छोटी बातों को लेकर भय और अवसाद से घिर जाता है।
वेदना सहने का विज्ञान : समस्या निमित्त है, उपादान नहीं– शांतिदूत ने शारीरिक और मानसिक पीड़ा के समय आत्मा को स्थिर रखने का व्यावहारिक मार्ग बताया।
१. बाहरी समस्या से भीतर क्यों अशांति? : डॉक्टर, अस्पताल, दवाइयाँ और इंजेक्शन शारीरिक व्याधि के कारण अनिवार्य हो सकते हैं, जो उम्र के किसी भी पड़ाव में आ सकते हैं। परंतु बाहरी समस्याएँ मानसिक दुःख में केवल 'निमित्त' (बाहरी कारण) बनती हैं, वे 'उपादान' (भीतरी कारण) नहीं हैं। यदि हमारा चिंतन प्रशस्त है और संतोष का आलंबन है, तो भीतर में आवेश और मानसिक वेदना कभी प्रवेश नहीं कर सकती।
२. कर्म निर्जरा का उत्तम माध्यम : जीवन में आई किसी भी कठिन शारीरिक या मानसिक परिस्थिति को कोसने के बजाय उसे 'कर्म निर्जरा' का माध्यम मानकर समता भाव से सहन करने का पुरुषार्थ करना चाहिए।
विनय प्रतिपत्ति और आचार्य भिक्षु का अदम्य साहस– पूज्य प्रवर ने आचरण की शुद्धता और संघ की मर्यादा को लेकर कड़े निर्देश दिए।
१. बड़ों के उलाहने को सहें : यदि जीवन में बड़े कुछ कड़ा कह दें या कोई उलाहना दे दें, तो भीतर में आवेश लाने के बजाय पूरी विनय प्रतिपत्ति (नम्रता) के साथ उसे सहजता से स्वीकार करना चाहिए। यही उत्कृष्ट भावना मोहनीय कर्म को कमज़ोर करती है। २. सत्पुरुषार्थ कभी खाली नहीं जाता : कभी-कभी मेहनत का तुरंत फल न मिलने पर इंसान गुस्से में आ जाता है; परंतु अटूट विश्वास रखें कि सत्पुरुषार्थ का फल आज नहीं तो कल, और कल नहीं तो अगले जन्मों में अवश्य मिलता है।
३. न झुकना है, न मुड़ना है : आचार्यश्री भिक्षु के जीवन का स्मरण कराते हुए पूज्य प्रवर ने फरमाया कि स्वामी जी के सामने ढेरों विपरीत परिस्थितियाँ आईं, पर वे सत्य के मार्ग पर न कभी झुके और न कभी मुड़े। उनके जीवन से हर साधक और गृहस्थ को साहस व समता की प्रेरणा लेनी चाहिए कि कठिनाइयाँ चाहे कितनी भी आ जाएँ, आत्मसम्मान और धर्म के मार्ग से पीछे नहीं हटना है। मंगल देशना के संपन्न होने पर परम पूज्य आचार्य प्रवर ने सुधर्मा सभा में उपस्थित चारित्रात्माओं द्वारा आगम चर्या, संयम की सूक्ष्म मर्यादाओं और तत्व-ज्ञान को लेकर प्रस्तुत की गई विभिन्न गहन जिज्ञासाओं का सहजता से समाधान किया।