बिना कैंची-उस्तरे के हाथों से केशलुंचन करना है सर्वोच्च तप : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 16 जून, 2026

बिना कैंची-उस्तरे के हाथों से केशलुंचन करना है सर्वोच्च तप : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अधिशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने जैन विश्व भारती परिसर स्थित सुधर्मा सभा में 'केशलुंचन एक चिंतन' विषय पर पावन आगम देशना प्रदान की। पूज्य प्रवर ने साधु जीवन की तीन सबसे कठिन मर्यादाओं—कापोतीवृत्ति, केशलुंचन और घोर ब्रह्मचर्य व्रत का वैज्ञानिक व तात्विक विश्लेषण प्रस्तुत किया।
केशलोच का विज्ञान: कैंची या उस्तरे का प्रयोग जैन शासन में क्यों वर्जित?– आचार्य प्रवर ने हाथों से बाल उखाड़ने की इस दारुण परंपरा के पीछे छिपे अहिंसा के सूक्ष्म रहस्यों को खोला।
१. सूक्ष्म जीवों की रक्षा : मस्तक पर कैंची, रेज़र या उस्तरे जैसे आधुनिक साधनों का उपयोग करने से बालों में छिपे सूक्ष्म जीवों (जैसे जूँ आदि) की हिंसा होने का भयंकर खतरा रहता है। हाथों से एक-एक बाल उखाड़ने पर पूर्ण अहिंसा का पालन सुनिश्चित हो जाता है।
२. शस्त्रों का वर्जन : जैन मुनि पूर्ण रूप से अहिंसा के पुजारी होते हैं, वे कैंची या उस्तरे जैसे तीखे लौकिक साधनों को हाथ में क्यों लें? इसीलिए हाथों से ही लोच करने की विधा अनादि काल से चली आ रही है।
३. काय-क्लेश तप और सहिष्णुता : बाल सौंदर्य का प्रतीक (अलंकार) होते हैं और साधक को किसी भी प्रकार के श्रृंगार की अनुमति नहीं होती। केशलुंचन की इस दारुण पीड़ा को समता भाव से सहना काय-क्लेश तप है, जो साधक के पौरूष को दर्शाता है। मुनि वर्ष में दो बार (संवत्सरी से पूर्व अनिवार्य रूप से) मुंडित होते हैं।
साधु चर्या की दो अन्य दुष्कर बातें : कापोतीवृत्ति और घोर ब्रह्मचर्य – शांतिदूत ने आगम वाणियों के आलोक में साधक जीवन की दुर्गम कसौटियों को रेखांकित किया।
१. कबूतर जैसी पापभीरुता : जैसे कबूतर ज़मीन से अन्न का एक-एक दाना चुगते समय पल-पल सशंक और चौकन्ना रहता है, वैसे ही जैन मुनि को गोचरी (भिक्षा) लेते समय बेहद सावधान रहना चाहिए कि चर्या में कोई दोष या पाप न लग जाए। नि स्वयं भोजन नहीं बनाते, बल्कि भँवरे की तरह गृहस्थों के घरों में बने सहज शुद्ध आहार में से थोड़ा-थोड़ा अंश ग्रहण कर संयम यात्रा का निर्वाह करते हैं।
३. घोर ब्रह्मचर्य की साधना : शास्त्र में तीसरी सबसे कठिन बात 'घोर ब्रह्मचर्य महाव्रत' का पालन बताई गई है, जिसके प्रति पल-पल की चेतना और अकर्तव्य कार्यों से भीरुता रखना अनिवार्य है।
मुख्य मुनिश्री का उद्बोधन और योगक्षेम वर्ष का व्यवस्थित कैलेंडर: मंगल प्रवचन के क्रम में मुख्य मुनि महावीर कुमार जी ने संघ को संबोधित करते हुए कहा कि आचार्यप्रवर की अनूठी दूरदृष्टि के कारण इस 'योगक्षेम वर्ष' का एक बेहद व्यवस्थित आध्यात्मिक कैलेंडर तैयार हुआ है। पूरे वर्ष के कार्यक्रम इसी के अनुसार संपादित हो रहे हैं, जिससे साधु-साध्वी वर्ग सहित पूरा श्रावक समाज वैचारिक रूप से भावित हो रहा है। प्रवचन के अंत में पूज्य प्रवर ने चारित्रात्माओं की सूक्ष्म जिज्ञासाओं का सहज समाधान किया।