गुरुवाणी/ केन्द्र
जागरूकता के साथ बढ़ाए गए कदम ही धर्म हैं, लापरवाही से चलना तो अंधकार की ओर बढ़ना है : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के अधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक, महातपस्वी आचार्य श्री महाश्रमण जी ने जैन विश्व भारती की सुधर्मा सभा में 'उपयोगपूर्वक चलें' विषय पर आगम सम्मत पावन पाथेय प्रदान किया। आचार्यश्री ने चेतना की एकाग्रता को मोक्ष मार्ग का आधार बताते हुए साधुओं के साथ-साथ गृहस्थों को भी दैनिक जीवन में पूर्ण जागरूक होकर चलने की कड़ी नसीहत दी।
जैन विद्या का कड़ा सिद्धांत : साकार और अनाकार उपयोग के 12 भेद : आचार्य प्रवर ने जीव के मुख्य लक्षण 'उपयोग' (चेतना की प्रवृत्ति) का गहरा दार्शनिक विवेचन किया।
१. ज्ञान और दर्शन का भेद: उपयोग के मुख्य रूप से दो भेद हैं—साकार (ज्ञान) और अनाकार (दर्शन)। पर्याय को ग्रहण करने के कारण ज्ञान साकार होता है। कुल मिलाकर उपयोग के 12 भेद शास्त्रों में बताए गए हैं।
२. मिथ्यात्वी का अज्ञान : जब तक केवलज्ञान की प्राप्ति नहीं हो जाती,
तब तक ज्ञानावरणीय कर्म के उदय से जनित अज्ञान किसी न किसी रूप में बना रहता है।
मति अज्ञान, श्रुत अज्ञान और विभंग अज्ञान—ये तीन अज्ञान मिथ्यात्वी जीव के पास होते हैं, इसलिए इन्हें अज्ञान की संज्ञा दी गई है।
मार्ग में चलने का विज्ञान : ४ प्रकार की यतना और कड़े नियम
शांतिदूत ने आगम के अनुरूप सुरक्षित और संयमित विहार के लिए चार यतनाओं की व्याख्या की।
१. द्रव्यतः और क्षेत्रतः यतना: आँखों का पूरा उपयोग करके नीचे देख-देखकर चलना 'द्रव्यतः यतना' है, जिससे मार्ग के जीव-जंतुओं की रक्षा हो सके। अपने शरीर के प्रमाण की भूमि को देख-देखकर कदम बढ़ाना 'क्षेत्रतः यतना' है।
२. कालतः और भावतः यतना: जब तक यात्रा चले, तब तक लगातार सजगता से देखना 'कालतः यतना' है और चलने की क्रिया में पूरी तरह एकाग्रचित्त (होश में) रहना 'भावतः यतना' है।
३. मल्टीटास्किंग पर प्रहार : चलते समय केवल चलने की क्रिया मुख्य होनी चाहिए। इधर-उधर देखना या कान में कुछ सुनते हुए चलना आत्मा और शरीर दोनों के लिए घातक है। यदि कोई आवश्यक बात करनी हो, तो रास्ते में रुककर (ठहर कर) करनी चाहिए। चलते-चलते कुछ भी खाना या पीना पूरी तरह वर्जित होना चाहिए।
४. ट्रैफिक नियमों का पालन : आचार्यश्री ने विशेष निर्देश दिया कि विहार के समय आध्यात्मिक सजगता के साथ-साथ सड़क के ट्रैफिक नियमों का भी पूर्ण ईमानदारी से पालन किया जाना चाहिए।
हाजरी वाचन, पुस्तक लोकार्पण और शिविर उपसंपदा : सुधर्मा सभा में अध्यात्म और साहित्य के कई महत्वपूर्ण उपक्रम एक साथ संपन्न हुए।
१.हाजरी और पांच कल्याणक बख्शीश : चतुर्दशी के पावन प्रसंग पर पूज्य प्रवर ने मर्यादा पत्र (हाजरी) का वाचन कर चारित्रात्माओं को संयम की प्रेरणा दी।
आचार्यश्री की अनुज्ञा से साध्वी पद्मप्रभा जी ने लेखपत्र का उच्चारण किया, जिस पर प्रसन्न होकर आचार्य प्रवर ने उन्हें 'पांच कल्याणक' बख्शीश किए। इसके बाद सभी संतों-साध्वियों ने अपने स्थान पर खड़े होकर मर्यादा लेखपत्र का सामूहिक उच्चारण किया।
२. अंग्रेजी पुस्तक का लोकार्पण : जैन विश्व भारती द्वारा आचार्यश्री महाश्रमण जी की मूल कृति ‘क्या कहता है जैन वाङ्मय’ का साध्वी चारित्रयशा जी द्वारा अंग्रेजी में अनुवादित ग्रंथ का पूज्य प्रवर के कर-कमलों द्वारा भव्य लोकार्पण किया गया।
३. प्रेक्षाध्यान शिविर संपन्न : लाडनूं में चल रहे विशेष प्रेक्षाध्यान शिविर के सभी देश-विदेश से आए संभागियों को आचार्यश्री ने मंत्रोच्चार के साथ शिविर की 'उपसंपदा' (दीक्षा-सर्टिफिकेट) प्रदान कर आध्यात्मिक जीवन जीने का आशीर्वाद दिया।