गुरुवाणी/ केन्द्र
तीर भले चूक जाए, पर बेजुबान को मारने की नीयत मात्र से लग जाता है 'भाव हिंसा' का महापाप : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, तीर्थंकर महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने सुधर्मा सभा में 'सब जीवों के प्रति समता' विषय पर उत्तराध्ययन सूत्र के माध्यम से गहन तात्विक अमृत देशना प्रदान की। आचार्यश्री ने जैन दर्शन के सबसे सूक्ष्म सिद्धांत—द्रव्य हिंसा और भाव हिंसा के आपसी संबंधों को खोलते हुए समता और पूर्ण अहिंसा की साधना का पाठ पढ़ाया।
हिंसा-अहिंसा का दार्शनिक गणित : कर्म बंध के ४ भंग : आचार्य प्रवर ने शिकारी और मुनि के अद्भुत उदाहरणों से कर्म सिद्धांत के चार समीकरणों (भंगों) को स्पष्ट किया।
१. केवल भाव हिंसा (द्रव्य हिंसा नहीं) : एक शिकारी जंगल में शिकार के इरादे से निशाना साधकर तीर चलाता है, लेकिन निशाना चूक जाता है और जीव बच जाता है। यहाँ भले ही कोई जीव नहीं मरा (द्रव्य हिंसा नहीं हुई), लेकिन जीव को मारने की क्रूर नीयत के कारण शिकारी को 'भाव हिंसा' का पूरा पाप लग जाता है।
२. केवल द्रव्य हिंसा (भाव हिंसा नहीं) : एक जैन मुनि पूरे संयम और जागरूकता से चल रहे हैं, लेकिन अचानक तेज बारिश होने या अनिवार्य मार्ग में घास होने के कारण कच्चे पानी व वनस्पति के जीवों का स्पर्श हो जाता है। यदि मुनि के मन में समता है और कोई बुरी नीयत नहीं है, तो यह केवल बाह्य 'द्रव्य हिंसा' है, 'भाव हिंसा' नहीं।
३. द्रव्य और भाव दोनों हिंसा : यदि शिकारी का निशाना सही लग जाता और जीव मर जाता, तो वहाँ बाह्य शरीर की हिंसा (द्रव्य) और भीतर के क्रूर भाव (भाव) दोनों प्रकार की महाहिंसा घटित हो जाती।
४. संपूर्ण अहिंसा (न द्रव्य, न भाव) : जब साधु पूर्ण जागरूकता से समितियों का पालन करते हुए चर्या करता है और कोई जीव नहीं मरता, वहाँ आत्मा पूरी तरह निष्पाप और अहिंसक होती है।
समता और अहिंसा का अटूट रिश्ता : जीवन सबको प्रिय है
शांतिदूत ने सर्व प्राणातिपात विरमण महाव्रत की दुष्कर साधना को रेखांकित करते हुए मुख्य बिंदु समझाए।
1. करुणा का आत्मवत् सिद्धांत : हर जीव को अपने समान समझना ही समता है। इंसान को यह सोचे बिना कदम नहीं बढ़ाना चाहिए कि—'जैसे मुझे अपना जीवन प्रिय है, वैसे ही दुनिया के अन्य छोटे-बड़े जीवों को भी मरना अप्रिय और अत्यंत भयंकर लगता है।
जो मुनिवर जीवन भर के लिए इस कठिन अहिंसा की साधना करते हैं, वे धन्य हैं।
2. जागरूकता ही सबसे बड़ा कवच : मुनि जीवन में पाँचों समितियों (ईर्या, भाषा, एषणा आदि) और हर शारीरिक प्रवृत्ति में पल-पल की जागरूकता रखना अनिवार्य है, ताकि भाव अहिंसा अखंड बनी रहे।
गृहस्थों का कर्तव्य : साधु साधना में सहयोग और संकल्प व्रत– पूज्य प्रवर ने श्रावक वर्ग की सीमाओं को ध्यान में रखते हुए आचरण का व्यावहारिक मार्ग बताया।
1. अपरिग्रही संतों का संबल बनें : गृहस्थों को यह चिंतन रखना चाहिए कि साधु पूर्ण रूप से अपरिग्रही और भिक्षाजीवी होते हैं। अतः श्रावकों को संतों की साधना में निर्विघ्न सहयोग के लिए शुद्ध वस्त्र, पात्र और औषधि आदि बहराकर पुण्य अर्जन करना चाहिए।
2. संकल्प पूर्वक वध से बचें : गृहस्थ जीवन में चूल्हा जलाने या व्यापार (आरंभजा व प्रतिरोधुता हिंसा) से पूरी तरह बचना मुश्किल है; परंतु कम से कम हर श्रावक को 'स्थूल प्राणातिपात विरमण व्रत' स्वीकार करना चाहिए। संकल्प पूर्वक, कषाय के वशीभूत या आवेश में आकर किसी भी बेजुबान प्राणी का वध न हो, यह हर गृहस्थ का अनिवार्य आचार होना चाहिए।
मंगल प्रवचन के संपन्न होने पर पूज्य प्रवर आचार्यश्री ने सुधर्मा सभा में उपस्थित चारित्रात्माओं द्वारा संयम की सूक्ष्म मर्यादाओं, आगम चर्या और तत्व-ज्ञान को लेकर प्रस्तुत की गई विभिन्न गहन जिज्ञासाओं का सहजता से समाधान किया।