परलोक के अनजान रास्ते पर धन की तिजोरी नहीं, सिर्फ  'धर्म का टिफिन' ही बचाएगा संकटों से : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 12 जून, 2026

परलोक के अनजान रास्ते पर धन की तिजोरी नहीं, सिर्फ 'धर्म का टिफिन' ही बचाएगा संकटों से : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, शांतिदूत, युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी ने सुधर्मा सभा में 'अपाथेय आगे न जाएं' विषय पर उत्तराध्ययन सूत्र के माध्यम से पावन पाथेय प्रदान किया। आचार्यश्री ने पुनर्जन्म के अटल सिद्धांतों को रेखांकित करते हुए मानव जीवन को अगले जन्म की यात्रा के लिए समय रहते 'धार्मिक पुण्य का टिफिन' तैयार करने की मर्मस्पर्शी प्रेरणा दी।
पुनर्जन्म का विज्ञान: सातवें गुणस्थान के बाद नहीं होता आयुष्य बंध– आचार्य प्रवर ने जैन दर्शन के पुनर्जन्मवाद और कर्म सिद्धांतों का तात्विक विवेचन प्रस्तुत किया।
१. पुनर्जन्म के शाश्वत नियम : जैन वाङ्मय पुनर्जन्म को मजबूती से प्रतिपादित करता है। जीव अगले जन्म में कहाँ से आता है और मृत्यु के बाद कहाँ जाता है, इसके निश्चित नियम हैं।
२. आयुष्य बंध की सीमा : आगामी जन्म के लिए आयुष्य का बंधन आध्यात्मिक विकास के सातवें गुणस्थान के बाद नहीं होता है। यह प्रक्रिया सातवें गुणस्थान में प्रारंभ भी नहीं होती; बल्कि छठे गुणस्थान में शुरू होकर सातवें में समाप्त हो सकती है।
साधु जीवन का पाथेय : सेवा भी है निर्जरा का महातप– शांतिदूत ने चारित्रात्माओं को संयम पथ पर निरंतर गतिमान रहने और आध्यात्मिक कमाई बढ़ाने के निर्देश दिए।
१. सेवा सापेक्ष संतों का संबल : संघ में जो संत वृद्ध, बीमार या सेवा सापेक्ष (ग्लान) हैं, उन्हें अपने पास रखकर अहोभाव और विनय पूर्वक उनकी समुचित सेवा करनी चाहिए। पीड़ितों की सेवा करना साक्षात कर्मों को खपाने (निर्जरा) का एक उत्कृष्ट तप है।
२. आगम गाथाएं हों कंठस्थ : साधकों को असंग और अनासक्त रहकर स्वाध्याय, ध्यान, समितियों और गुप्तियों में पूर्ण जागरूकता रखनी चाहिए। जितना संभव हो, ज्ञान को कंठस्थ करना चाहिए। विशेषकर 'उत्तराध्ययन सूत्र' और 'दशवैकालिक सूत्र' जैसी महान आगम वाणियां संतों को मुखजबानी याद होनी चाहिए।
गृहस्थ जीवन की कमाई: ईमानदारी और सुमंगल साधना– पूज्य प्रवर ने श्रावक वर्ग को वर्तमान सुखों का मूल कारण समझाते हुए भविष्य को सुधारने का मार्ग बताया।
२. बुढ़ापे में समता की जरूरत : ढलती उम्र में इंसान को तमाम तरह की भौतिक लालसाओं, वासनाओं और अभिलाषाओं के जाल से बाहर निकलने का सचेत प्रयास करना चाहिए। वृद्धावस्था का समय केवल और केवल संयम, समता, साधना और आंतरिक शांति में व्यतीत होना चाहिए।
किंपाक फल जैसे हैं सांसारिक भोग: साधुत्व ही चिंतामणि – पूज्य प्रवर ने आगम गाथाओं के आलोक में भोगों के अंतिम विपाक (परिणाम) को स्पष्ट किया।
१. शुरुआत सुंदर, अंत प्राणांत : जैन आगमों में भोगों की तुलना 'किंपाक फल' से की गई है। किंपाक फल दिखने में अत्यंत सुंदर, आकर्षक और खाने में बेहद स्वादिष्ट होता है, परंतु उसे चखने का अंतिम परिणाम साक्षात मौत (प्राणांत) होता है। ठीक इसी तरह, संसार के भोग तात्कालिक रूप से बहुत भले और सुखद लगते हैं, पर उनका अंतिम परिणाम आत्मा के लिए अत्यंत कड़वा और दुर्गति देने वाला होता है।
२. साधुत्व है चिंतामणि रत्न : जो जीव भोगों की इस क्षणभंगुरता को देखकर वैराग्य के पथ पर बढ़ जाता है और साधुत्व (दीक्षा) को अंगीकार कर लेता है, उसे मानो संसार का सबसे अमूल्य 'चिंतामणि रत्न' मिल जाता है। जीवन भर निष्कलंक साधु धर्म का पालन करना ब्रह्मांड की सबसे बड़ी उपलब्धि है। क्रोध, मान, माया और लोभ रूपी कषायों को बाहर निकालकर मन को निर्मल और राग-द्वेष मुक्त करने से ही आत्मा के साक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त होता है।
मंगल प्रवचन के संपन्न होने पर पूज्य प्रवर आचार्यश्री ने सुधर्मा सभा में उपस्थित चारित्रात्माओं द्वारा आचार-चर्या, संयम की मर्यादा और तात्विक विषयों को लेकर प्रस्तुत की गई विभिन्न जिज्ञासाओं का सहजता से समाधान कर सबको कृतार्थ किया।