काया तो बुढ़ापे से कमजोर हो गई, पर भीतर की सांसारिक तृष्णा आज भी अमर है : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 11 जून, 2026

काया तो बुढ़ापे से कमजोर हो गई, पर भीतर की सांसारिक तृष्णा आज भी अमर है : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अखंड परिव्राजक, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने सुधर्मा सभा में 'भुक्त भोग का परिणाम कैसा?' विषय पर उत्तराध्ययन सूत्र के माध्यम से मर्मस्पर्शी पावन पाथेय प्रदान किया। आचार्यश्री ने किंपाक फल और व्यावहारिक व्यसनों के उदाहरण देकर मानव चेतना को जागृत करते हुए भोगों से विरक्ति और आंतरिक निर्मलता का पाठ पढ़ाया।
भोगों का भ्रम : हम भोगों को नहीं, भोग हमें
भोगते हैं : आचार्य प्रवर ने मनुष्य की वैचारिक अज्ञानता पर कड़ा प्रहार करते हुए मुख्य बिंदु रेखांकित किए।
१. व्यसन का चक्रव्यूह : संसार में यह भ्रम है कि मनुष्य पदार्थों का उपभोग कर रहा है, पर कड़वा सच यह है कि पदार्थ मनुष्य को अपनी गिरफ्त में ले लेते हैं। जैसे शुरुआत में आदमी शौक से शराब पीता है या जरदा-गुटखा खाता है, पर बाद में वही शराब और गुटखा उस आदमी के जीवन, स्वास्थ्य और चेतना को पूरी तरह पीना व खाना शुरू कर देते हैं। २. ताप और तनाव से तप्त जीवन : इंसान सोचता है कि वक्त बीत रहा है, पर असल में वक्त नहीं, इंसान खुद बीत जाता है। बचपन और जवानी की शारीरिक क्षमताएं कब चली जाती हैं, पता ही नहीं चलता। मनुष्य जीवन भर प्रभु स्मरण या तपस्या तो नहीं करता, पर संसार के अवांछित मानसिक ताप और तनाव की भट्टी में खुद को जीवन भर तपाता रहता है। तृष्णा कभी बूढ़ी नहीं होती : अमर लालसा का सत्य– शांतिदूत ने वृद्धावस्था के मनोवैज्ञानिक सच को उजागर करते हुए आत्म-निरीक्षण की सीख दी।
१. जीर्ण शरीर, युवा आकांक्षाएं : काल के प्रभाव से मनुष्य का शरीर तो जीर्ण-शीर्ण, कमजोर और बूढ़ा हो जाता है, परंतु उसके भीतर बैठी सांसारिक सुखों की तृष्णा कभी बूढ़ी नहीं होती; वह बुढ़ापे में भी उतनी ही जवान और बलवान बनी रहती है। १.पूर्व जन्म की कमाई है वर्तमान सुख: आज गृहस्थ जीवन में हमें जो भी सुख-सुविधाएं और अनुकूलताएं मिली हुई हैं, वे हमारे किसी पूर्व जन्म की धार्मिक कमाई का ही फल हैं। अतः इस जीवन में आकर बैठ नहीं जाना है, बल्कि अगले जन्म की यात्रा को सुखमय बनाने के लिए धार्मिक कमाई का टिफिन अभी से पैक करना शुरू कर देना चाहिए।
२. ६० वर्ष के बाद सुमंगल साधना : गृहस्थों के लिए श्रावक के 12 व्रतों का सम्यक् पालन, शुद्ध आचार और उत्तम विचार ही धर्म का असली टिफिन हैं। विशेष रूप से 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों के लिए 'सुमंगल साधना' का उपक्रम परलोक सुधारने का सबसे बड़ा संबल है। जीवन में जितनी ईमानदारी रहेगी, नशों से जितनी दूरी रहेगी और जितनी सेवा की भावना होगी, अगली गति उतनी ही पाथेय युक्त (सुखद) बनेगी। मंगल प्रवचन के संपन्न होने पर पूज्य प्रवर आचार्यश्री ने सुधर्मा सभा में उपस्थित चारित्रात्माओं द्वारा संघ मर्यादा, चर्या और आगम के गूढ़ रहस्यों के संदर्भ में प्रस्तुत की गई विभिन्न जिज्ञासाओं का सहज समाधान कर सबको कृतार्थ किया।