स्वाध्याय
3 बातें ज्ञान की
प्रश्न हो सकता है कि शुभ मनोयोग, शुभ वचनयोग, शुभ काययोग से लाभ क्या होता है? इससे दो लाभ होते हैं। पहला लाभ है-अशुभ कर्म टूटते हैं, निर्जरा होती है, आत्मा उज्ज्वल बनती है। दूसरा लाभ है-निर्जरा के साथ पुण्य का बंध होता है। जैसे साधु को वंदन करने से नीच गोत्र कर्म का क्षरण और उच्च गोत्र कर्म का बंधन होता है। शुभ योग से दो कार्य निष्पन्न हो गए-कर्मों की निर्जरा और साथ में पुण्य का बंध। इन दोनों में पहले कौन और बाद में कौन पर विचार करें तो पहले पुण्य का बंध होता है और बाद में निर्जरा होती है।
परम पूज्य गुरुदेव तुलसी ने एक बार फरमाया था कि ज्योंही शुभ योग होता है, निर्जरा
और पुण्य दोनों काम एक साथ शुरू होते हैं, परन्तु पुण्य का बंध पहले संपन्न होता है और
निर्जरा का काम बाद में संपन्न होता है, इसलिए पहले पुण्य, बाद में निर्जरा की बात कही गई है। शुभ योग से निर्जरा होती है, साथ में पुण्य का बंध होता है, यह एक स्वाभाविक-सी बात है। जैसे अनाज होता है, साथ में तूड़ी, भूसी भी होती है। इसी तरह निर्जरा होती है और साथ में पुण्य का बंध भी होता है।
आदमी अशुभ योग से बचने का प्रयास करे। असत् कल्पना न करे, असत् वाणी का प्रयोग न करे, असत् कायिक चेष्टा न करे। आदमी असत् से बचने का और शुभ योग में रहने का प्रयास करे। अगर यह ध्यान रहे कि हम अशुभ योग में न जाएं तो बहुत बड़ी साधना है। साधुत्व और है क्या? अशुभ योग का सेवन नहीं करना, यही मुख्यतः साधुत्व है।
योग अशुभ क्यों होता है? इसका मूल जिम्मेदार मोहनीय कर्म है। जब योग के साथ मोहनीय कर्म का संयोग हो जाता है तो योग अशुभ बन जाता है और जब मोहनीय कर्म का वियोग हो जाता है तो योग शुभ बन जाता है। योग को शुभ-अशुभ बनाने वाला मोहनीय कर्म होता है। जैसे वर्षा का पानी एक बाल्टी में एकत्रित किया। पानी अपने आपमें साफ है, शुद्ध है। आंधी आई और पानी गंदा हो गया। पानी तो शुद्ध था, रजकणें मिल गईं तो पानी गंदा हो गया। अब वापस प्रक्रिया से रजकणों को दूर कर दिया जाए तो वह पानी वापस निर्मल हो जाता है। योग अपने आपमें ठीक है। मोह कर्म रूपी रजकणें मिलती हैं तो योग अशुभ बन जाता है। आदमी मोह कर्म को दूर रखने का प्रयास करे तो योग निर्मल रहेगा।
कुछ जीव एक योग वाले होते हैं, कुछ जीव दो योग वाले होते हैं, कुछ जीव तीन योग वाले होते हैं और कुछ मनुष्य योग-रहित यानी अयोगी होते हैं। अयोगी केवल मनुष्य ही हो सकता है। शेष सारे प्राणी योग-सहित होते हैं। पांच स्थावरकाय में एक योग होता है। द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय और चतुरिन्द्रिय में दो योग होते हैं और संज्ञी पंचेन्द्रिय में तीनों योग होते हैं। एक योग होगा तो मात्र एक काययोग ही होगा। दो योग होंगे तो काययोग और वचनयोग ही होंगे। जहां तीनों योग होंगे, वहां मनोयोग जुड़ जाएगा। आदमी अपने योग त्रय को अशुभता से बचाने का प्रयास करे, यह साधना का महत्त्वपूर्ण सूत्र है।
तीन कारण अल्प आयुष्य के
ठाणं में बताया गया है– तिहिं ठाणेहिं जीवा अप्पाउयत्ताए कम्मं पगरेंति, तं जहा-पाणे अतिवातित्ता भवति, मुसं वइत्ता भवति, तहारूवं समणं वा माहणं वा अफासुएणं अणेसणिज्जेणं असणपाणखाइमसाइमेणं पडिलाभेत्ता भवति-इच्चेतेहिं तिहिं ठाणेहिं जीवा अप्पाउयत्ताए कम्मं पगरेंति । 3/17
तीन प्रकार से जीव अल्प आयुष्य कर्म का बंधन करते हैं-
1. जीवहिंसा से,
2. मृषावाद से,
3. तथारूप श्रमण माहन को अस्पर्शक तथा अनेषणीय अशन, पान, खाद्य, स्वाद्य का प्रतिलाभ (दान) करने से।
इन तीन प्रकारों से जीव अल्प आयुष्य कर्म का बंधन करते हैं।
संसार में दीर्घ जीवन का महत्त्व होता है। वर्तमान में सौ वर्ष का पूर्ण आयुष्य माना गया है, किन्तु आदमी छोटी अवस्था में भी चला जाता है। अल्प आयुष्य के बंधन का पहला कारण है-प्राणियों की हिंसा करना। आदमी कई बार बिना मतलब प्राणी की हिंसा कर देता है। जैसे, चींटियां चल रही हैं। जानबूझकर उन पर पैर रख दिया, चींटियां मर गईं। यह बिना मतलब प्राणियों की हिंसा हो गई। एक कमरे में कोई कबूतर है। मनोरंजन के लिए कमरे के सारे दरवाजे और खिड़कियां बन्द कर दीं।