श्रमण महावीर

स्वाध्याय

– आचार्यश्री महाप्रज्ञ

श्रमण महावीर

भगवान के सामने सारी बात रखकर बोले- 'भन्ते! क्या पावपत्यीय स्थविरों द्वारा प्रदत्त उत्तर सही है? क्या वे सही उत्तर देने में समर्थ हैं? क्या वे सम्यग्ज्ञानी हैं? क्या वे अभ्यासी और विशिष्ट ज्ञानी हैं?'
भगवान ने कहा– 'गौतम! पार्श्वापत्यीय स्थविरों द्वारा प्रदत्त उत्तर सही है। वे सही उत्तर देने में समर्थ हैं। मैं भी इन प्रश्नों का यही उत्तर देता हूं।'
'भन्ते! ऐसे श्रमणों की उपासना से क्या लाभ होता है?'
'सत्य सुनने को मिलता है।'
'भन्ते! उससे क्या होता है?'
'ज्ञान होता है।'
'भन्ते! उससे क्या होता है?'
'विज्ञान होता है-सूक्ष्म पर्यायों का विवेक होता है।'
'भन्ते! उससे क्या होता है?'
'प्रत्याख्यान होता है-अनात्मा से आत्मा का पृथक्करण होता है।'
'भन्ते! उससे क्या होता है?'
'संयम होता है।'
'भन्ते! उससे क्या होता है?'
'अनाश्रव होता है– अनात्मा और आत्मा का संपर्क-सेतु टूट जाता है।'
'भन्ते! उससे क्या होता है?'
'तप करने की क्षमता विकसित होती है।'
'भन्ते! उससे क्या होता है?'
'पूर्व-संचित कर्म-मल क्षीण होते हैं।'
'भन्ते ! उससे क्या होता है?'
'चंचलता विच्छिन्न होती है।'
'भन्ते! उससे क्या होता है।'
'सिद्धि होती है।'
२. भगवान पार्श्व का धर्म-तीर्थ भगवान महावीर के धर्म-तीर्थ से भिन्न था। उनके श्रमण भगवान महावीर के श्रमणों से मतभेद भी रखते थे। समय-समय पर वे महावीर के सिद्धान्तों की आलोचना भी करते थे। फिर भी भगवान महावीर ने पार्श्व के श्रमणों के यथार्थ-बोध का मुक्तभाव से समर्थन किया।
उस समय श्रमण संघों का लोक-संग्रह की ओर झुकाव नगण्य था। उनकी सारी शक्ति आत्म-साधना तथा सत्य-शोध में लगती थी। इसीलिए उसमें साम्प्रदायिक आग्रह नहीं पनपा। जैन श्रमणों का लोक-संग्रह की ओर झुकाव बढ़ा तब एक नियम बना कि जैन श्रमण दूसरे श्रमणों या परिव्राजकों का सत्कार-सम्मान न करे। दूसरे का सत्कार-सम्मान करने से जैन उपासकों में श्रद्धा की शिथिलता आती है। वे जैन श्रमणों की अपेक्षा उन्हें अधिक पूजनीय मानने लग जाते हैं। अतः उपासकों की श्रद्धा को सुदृढ़ बनाए रखने के लिए मुनि अन्यातीर्थीक साधुओं का सत्कार-सम्मान न करे।
भगवान महावीर के समय में यह नियम नहीं था। ऐसा प्रतीत होता है कि उस समय व्यवहार काफी मुक्त था। भगवान ने गौतम से कहा- 'गौतम! आज तुम अपने पूर्वपरिचित मित्र से मिलोगे।'
'भन्ते ! वह कौन है?'
'उसका नाम स्कंदक है।'
'भन्ते! मैं उससे कब मिलूंगा?'