स्वाध्याय
संबोधि
पूरक कर कुंभक करना। मूलबंध करना। मूलबंध से समस्त द्वारों का निरोध हो जाता है। उसके बाद ऐसा सोचना कि सुषुम्ना नाड़ी ऊपर बहती है। कुंभक द्वारा अवरुद्ध जो नाड़ियां और ग्रंथियां पहले अधोमुख थीं वे ऊर्ध्वमुख होकर विकसित होने लगती है।
कुंभक के बाद दिव्यकरण करना–
१. दिव्य-जिह्वा को तालु में लगाएं, किन्तु एकदम संयोजित न करें-जीभ और तालु के मध्य कुछ अंतर रहे।
२. मुंह को थोड़ा सा खुला रखें। होठ दोनों एकदम न सटे।
३. दांत परस्पर मिले हुए न हो।
४. दृष्टि को, आंखों में जो 'कीकी' है, उस पर स्थिर करें।
५. शरीर सीधा रहे।
पूरक-कुंभक ऊर्ध्व-रेचन द्वारा धीरे-धीरे मंत्रोच्चार करना। इस उच्चारण के साथ-साथ कुंभित प्राण का धीर-धीरे रेचन करना।
आचार्यश्री महाप्रज्ञ जप के लिए इस प्रकार सुझाव देते हैं-
'जप के साथ चार बातें जुड़ी हुई हैं– पद, रंग, स्थान और श्वास की स्थिति।
हम 'णमो अरहंताणं' को लें। इसका वर्ण है श्वेत और स्थान है मस्तिष्क, सहस्रार चक्र। इस पद का उच्चारण करते समय मन सहस्रार चक्र में स्थित हो और श्वेत वर्ण का चिंतन हो, आभास हो। सहस्रार चक्र अर्थात् ब्रह्मरंध्र, तालु के ऊपर का भाग। हमारी स्थिति कुंभक की हो तो चारों बातें हो गयीं-
पद है– णमो अरहंताणं। रंग है-श्वेत।
स्थान है– सहस्रार चक्र। श्वास की स्थिति है कुंभक। अन्तर् कुंभक।
'णमो सिद्धाणं' को लें। इसका वर्ण है-लाल। इसका स्थान है-ललाट का मध्य भाग-आज्ञा चक्र। श्वास की स्थिति होगी-कुंभक ।
'णमो आयरियाणं' यह तीसरा पद है। इसका रंग है पीला। इसका स्थान है-विशुद्ध चक्र, गला। यह पवित्रता का स्थान है, चक्र है। हमारी सारी भावनाओं और आवेगों पर नियंत्रण रखने वाला यही स्थान है। श्वास की स्थिति होगी अन्तर् कुंभक।
'णमो उवज्झायाणं' यह चौथा पद है। इसका रंग है नीला। इसका स्थान है-हृदय कमल। श्वास की स्थिति है-कुंभक।
'णमो लोए सव्वसाहूणं' यह पांचवां पद है। इसका रंग है कृष्ण-काला। इसका स्थान है पैरों का अंगूठा। श्वास की स्थिति है-कुंभक।
पांचों पदों में वर्ण भिन्न हैं, स्थान भिन्न हैं। श्वास की स्थिति पांचों में समान है। तो प्रत्येक के साथ पद, वर्ण, स्थान और श्वास की स्थिति चारों बातें जुड़ी हुई हैं। अब इसके साथ हमारे मन का पूरा योग रहना चाहिए। मन का योग होने से पांच बातें हो गई। पांचों का विधिवत् योग होने से ही जप शक्तिशाली होता है। एक की भी कमी परिणाम में न्यूनता ला देती है।'
नमस्कार स्वाध्याय में 'ॐ' के ध्यान के संबंध में इस प्रकार का उल्लेख प्राप्त होता है- 'ॐ ह्रीं नमः' 'ॐ' बीजाक्षरों में सम्राट् है। उसका सभी रंगों में पृथक् पृथक् कार्य के लिए ध्यान किया जा सकता है। शांति और निष्काम के लिए श्वेत वर्णमय 'ॐ ह्रीं नमः' का जप-ध्यान किया जाता है।'
मुक्ति के लिए नासाग्र पर 'ॐ अर्हम' इन तीनों वर्षों का ध्यान करें। आचार्य कहते हैं-इस अद्भुत मंत्र से ध्यान की परम शुद्धि प्राप्त होती है, आत्मिक सुख तथा सिद्धजन्य अष्ट गुणों की भी।
यदि तू वस्तुतः संसार-दुःख के अग्नितप से उद्विग्न है तो 'णमो अरहंताणं' इस सप्ताक्षर 'अर्हन्' नाम से उत्पन्न मंत्र का स्मरण कर। इस अनादि मंत्र से साधक सर्वज्ञ वैभव, विश्व विजय, मोक्ष और अर्हम के गुणों को उपलब्ध होते हैं।