जीने की कला सिखाता है- धर्म

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जयपुर।

जीने की कला सिखाता है- धर्म

कमला नेहरू नगर स्थित चौरड़िया में मंगल प्रवेश के उपरांत आयोजित धर्मसभा में मुनि तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने धर्म के वास्तविक स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए कहा कि 'धर्म जीने की कला का नाम है। जिसके जीवन में धर्म का प्रवेश हो जाता है, वह जीवन को सही अर्थों में जीना सीख जाता है। विवेकयुक्त आचरण ही एक धार्मिक व्यक्ति की पहचान है। उन्होंने कहा कि धर्म मनुष्य को परिस्थितियों के बीच संतुलित रहने की शिक्षा देता है। जीवन में समता और सहनशीलता का भाव विकसित करना धर्म का महत्वपूर्ण उद्देश्य है। आज शिक्षा के माध्यम से बौद्धिक विकास तो हो रहा है, लेकिन अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों में शांत तथा संतुलित बने रहने का प्रशिक्षण धर्म और अध्यात्म ही प्रदान करते हैं। मुनि श्री ने कहा कि आवेश और आवेग पर नियंत्रण के अभाव में व्यक्ति अपना मानसिक संतुलन खो बैठता है। इसके पीछे सहिष्णुता की कमी एक प्रमुख कारण है। धर्म व्यक्ति के भीतर धैर्य, संयम और सहनशीलता के संस्कार विकसित कर जीवन को अधिक सार्थक और सुखमय बनाता है। इस अवसर पर मुनि संभव कुमार जी ने कहा कि धर्म हमारी आंतरिक और मूलभूत समस्याओं का प्रभावी समाधान प्रस्तुत करता है। धर्म की साधना और उपासना के माध्यम से व्यक्ति अपनी अनियंत्रित वृत्तियों पर नियंत्रण करना सीखता है, जो सुख, शांति और आत्मिक संतोषपूर्ण जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है।