प्रज्ञा के अनुत्तर पुरुष - आचार्य महाप्रज्ञ

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मुनि मदन कुमार

प्रज्ञा के अनुत्तर पुरुष - आचार्य महाप्रज्ञ

आचार्य श्री महाप्रज्ञ प्रज्ञा पुरुष थे। वे जागृत चेतना के धनी थे। उन्होंने प्रज्ञा-जागरण के महान प्रयोग किये और प्रज्ञा के मंत्रदाता बन गये। उनका मानना था कि इन्द्रिय और मन के श्रम को न्यून कर अतीन्द्रिय चेतना और प्रज्ञा को जगाया जा सकता है। इसका तात्त्विक आधार यह है कि यह क्षयोपशम जन्य और साधनाजन्य है। प्रज्ञा की उपलब्धि मति ज्ञानावरण के विशिष्ट क्षयोपशम से होती है। उनकी उत्कृष्ट साधना से प्रभावित होकर आचार्य श्री तुलसी ने उन्हें महाप्रज्ञ अलंकरण प्रदान किया और वह अलंकरण ही उनका नामकरण
हो गया।
मुनि श्री नथमल और आचार्य श्री महाप्रज्ञ - इन दो विशिष्ट नामों से वे विश्व में ख्यात-नामा हो गये। जीवन निरन्तर उत्कर्ष की ओर बढ़ता गया।उनके अंतिम दशक में की गयी अहिंसा यात्रा ने उनके व्यक्तित्व और कर्तृत्व को बहुत यशस्वी बना दिया। उनके जादुई प्रवचनों ने लोगों के दिल-दिमाग को आनंद से सराबोर कर दिया। वे हिन्दू और मुस्लिम समाज को देवदूत की तरह प्रतीत होने लगे। उनके विराट व्यक्तित्व से प्रभावित होकर स्वामी अवधेशानन्द गिरी ने लिखा - 'युगपुरुष आचार्य श्री महाप्रज्ञ दर्शनीय ही नहीं अपितु अत्यन्त महनीय भी थे। ऐसा लगा मानो भगवत्ता धरा पर आविर्भूत हुई है।'
आचार्य श्री महाप्रज्ञ के विचारों की मुक्त कंठ से सराहना हुई है। मुझे एक योगी मिले थे। आध्यात्मिक संवाद चल रहा था। उन्होंने भाव विभोर स्वर में कहा - 'महावीर और महाप्रज्ञ इस धरा पर बार-बार जन्म नहीं लेते हैं।' मैं दिल्ली में श्री अटल बिहारी वाजपेयी से बात कर रहा था। वे आचार्य श्री महाप्रज्ञ के साहित्य के अच्छे पाठक रहे हैं। वार्ता के दौरान उन्होंने भावुक होकर कहा - 'मैं आचार्य महाप्रज्ञ के साहित्य का लोहा मानता हूँ।'
समस्या का समाधान देने वाला महामानव और महागुरु होता है।
सुप्रसिद्ध साहित्यकार यशपाल जैन के शब्दों में - 'आचार्य श्री महाप्रज्ञजी विद्वान् थे पर उनमें विद्वत्ता का भार नहीं था।' वे यथावादी - तथाकारी थे। उनमें आवेश, अभिमान आदि निषेधात्मक भाव क्षीण-प्रायः हो चुके थे। जैसे वीतरागता आने पर ही केवलज्ञान प्रकट होता है वैसे ही उपशम की साधना होने पर ही विशिष्ट मतिज्ञान और श्रुतज्ञान का प्रादुर्भाव होता है। उनके कुछ विचारों को यहां बिन्दु रूप में प्रस्तुत करना चाहता हूं।
राग और द्वेष कर्म के बीज हैं। राग होने पर द्वेष अवश्य होता है। व्यक्ति पहले वीतद्वेष बनता है और फिर वीतराग। इस तरह वीतरागता हमारा ध्येय बन जाता है। आचार्य श्री महाप्रज्ञ ने कहा कि राग और द्वेष में जन्य-जनक भाव है।
तपस्या के बारह प्रकार हैं। उपवास से निर्जरा होती है, किंतु उपवास से जो निर्जरा होती है, उससे कहीं ज्यादा निर्जरा स्वाध्याय और ध्यान से होती है। सुख, शान्ति और सुविधा को भिन्न-भिन्न मानना चाहिये! वर्तमान युग सुख का नहीं, सुविधा का युग है। इस सुविधावादी युग में सुख की खोज की जा रही है, लेकिन मिल नहीं रहा है। कारण यही है कि ज्ञान और श्रद्धा का समन्वय नहीं है। श्रद्धा और ज्ञान-इन दोनों का योग है शान्ति। जहां शान्ति है, वहां सुख है और जहां सुख है, वहां शान्ति है।